सरस किशोरी, वयस कि थोरी, रति सर बोरी, कीजै कृपा की कोर। [1]
साधन हीन, दीन मैं राधे, तुम करुणामई प्रेम-अगाधे,
काके द्वारे, जाय पुकारे, कौन निहारे, दीन दुखी की ओर। 2]
करत अघन नहिं नेकु उघाऊँ, भरत उदर ज्यों शूकर धावूँ,
करी बरजोरी, लखि निज ओरी, तुम बिनु मोरी, कौन सुधारे दोर। [3]
भलो बुरो जैसो हूँ तिहारो, तुम बिनु कोउ न हितु हमारो,
भानुदुलारी, सुधि लो हमारी, शरण तिहारी, हौं पतितन सिरमोर। [4]
गोपी-प्रेम की भिक्षा दीजै, कैसेहुँ मोहिं अपनी करी लीजै,
तव गुण गावत, दिवस बितावत, दृग झरि लावत, ह्वैहैं प्रेम-विभोर। [5]
पाय तिहारो प्रेम किशोरी!, छके प्रेमरस ब्रज की खोरी,
गति गजगामिनि, छवि अभिरामिनी, लखि निज स्वामिनी, बने ‘कृपालु’ चकोर॥ [6]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी, प्रेम रस मदिरा, प्रकीर्ण-माधुरी (22)
हे प्रेमरस-मयी किशोरी जी! हे किशोर-वय राधिके! हे प्रेमरस में सराबोर वृषभानुदुलारी! मुझ पर भी कृपा-दृष्टि कीजिए। [1]
हे किशोरी जी! मैं समस्त साधनों से रहित और अकिंचन हूँ, तथा आप अगाध-प्रेममयी, अकारण-करुणा की मूर्ति हैं; फिर आपको छोड़कर किसके सम्मुख अपना दुःख निवेदन करूँ? और यदि जाऊँ भी, तो मुझ जैसे अधम की ओर कौन दृष्टि डालेगा? [2]
हे किशोरी जी! निरन्तर पाप करते हुए भी मेरा चित्त कभी नहीं भरता, और शूकर के समान भटकता हुआ विषय-रूपी विष्ठा को ही खोजता रहता है। हे किशोरी जी! आपके अतिरिक्त दूसरा कौन है, जो अपनी अकारण कृपा से बरबस मेरी बिगड़ी बना दे? [3]
हे वृषभानुनन्दिनी! मैं भला-बुरा जैसा भी हूँ, आपका ही हूँ। आपके अतिरिक्त मेरा हितैषी दूसरा कौन है? हे भानुदुलारी! यद्यपि मैं पतितों का सरदार हूँ, फिर भी अब आपकी शरण में आ गया हूँ; मुझ पर कृपा कीजिए। [4]
हे रासेश्वरी! किसी प्रकार मुझे गोपी-प्रेम की भिक्षा देकर अपना बना लीजिए, जिससे मैं आपके प्रेम में पागल होकर, आपके गुणों का गान करता हुआ और नेत्रों से अश्रुधारा बहाता हुआ अपना जीवन व्यतीत करूँ। [5]
हे किशोरी जी! आपसे प्रेम प्राप्त कर प्रेम-रस में विभोर होकर मैं ब्रज की गली-गली में दीवाना बनकर डोला करूँ। सुन्दरता से भी अधिक सुन्दर, मतवाले गजराज के समान चाल वाली अपनी स्वामिनी को देखकर ‘कृपालु’ कहते हैं— मेरी आँखें कब चकोर के समान उस रूप-माधुरी का पान करेंगी? [6]
साधन हीन, दीन मैं राधे, तुम करुणामई प्रेम-अगाधे,
काके द्वारे, जाय पुकारे, कौन निहारे, दीन दुखी की ओर। 2]
करत अघन नहिं नेकु उघाऊँ, भरत उदर ज्यों शूकर धावूँ,
करी बरजोरी, लखि निज ओरी, तुम बिनु मोरी, कौन सुधारे दोर। [3]
भलो बुरो जैसो हूँ तिहारो, तुम बिनु कोउ न हितु हमारो,
भानुदुलारी, सुधि लो हमारी, शरण तिहारी, हौं पतितन सिरमोर। [4]
गोपी-प्रेम की भिक्षा दीजै, कैसेहुँ मोहिं अपनी करी लीजै,
तव गुण गावत, दिवस बितावत, दृग झरि लावत, ह्वैहैं प्रेम-विभोर। [5]
पाय तिहारो प्रेम किशोरी!, छके प्रेमरस ब्रज की खोरी,
गति गजगामिनि, छवि अभिरामिनी, लखि निज स्वामिनी, बने ‘कृपालु’ चकोर॥ [6]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी, प्रेम रस मदिरा, प्रकीर्ण-माधुरी (22)
हे प्रेमरस-मयी किशोरी जी! हे किशोर-वय राधिके! हे प्रेमरस में सराबोर वृषभानुदुलारी! मुझ पर भी कृपा-दृष्टि कीजिए। [1]
हे किशोरी जी! मैं समस्त साधनों से रहित और अकिंचन हूँ, तथा आप अगाध-प्रेममयी, अकारण-करुणा की मूर्ति हैं; फिर आपको छोड़कर किसके सम्मुख अपना दुःख निवेदन करूँ? और यदि जाऊँ भी, तो मुझ जैसे अधम की ओर कौन दृष्टि डालेगा? [2]
हे किशोरी जी! निरन्तर पाप करते हुए भी मेरा चित्त कभी नहीं भरता, और शूकर के समान भटकता हुआ विषय-रूपी विष्ठा को ही खोजता रहता है। हे किशोरी जी! आपके अतिरिक्त दूसरा कौन है, जो अपनी अकारण कृपा से बरबस मेरी बिगड़ी बना दे? [3]
हे वृषभानुनन्दिनी! मैं भला-बुरा जैसा भी हूँ, आपका ही हूँ। आपके अतिरिक्त मेरा हितैषी दूसरा कौन है? हे भानुदुलारी! यद्यपि मैं पतितों का सरदार हूँ, फिर भी अब आपकी शरण में आ गया हूँ; मुझ पर कृपा कीजिए। [4]
हे रासेश्वरी! किसी प्रकार मुझे गोपी-प्रेम की भिक्षा देकर अपना बना लीजिए, जिससे मैं आपके प्रेम में पागल होकर, आपके गुणों का गान करता हुआ और नेत्रों से अश्रुधारा बहाता हुआ अपना जीवन व्यतीत करूँ। [5]
हे किशोरी जी! आपसे प्रेम प्राप्त कर प्रेम-रस में विभोर होकर मैं ब्रज की गली-गली में दीवाना बनकर डोला करूँ। सुन्दरता से भी अधिक सुन्दर, मतवाले गजराज के समान चाल वाली अपनी स्वामिनी को देखकर ‘कृपालु’ कहते हैं— मेरी आँखें कब चकोर के समान उस रूप-माधुरी का पान करेंगी? [6]

