श्री राधे हमारी सरकार, फिकिर मोहिं काहे की। [1]
हित अधम उधारन देह धरें,
बिनु कारन दीनन नेह करें,
जब ऐसी दया दरबार, फिकिर मोहिं काहे की। [2]
टुक निज-जन क्रन्दन सुनि पावें,
तजि श्यामहुँ निज जन पहँ धावें,
जब ऐसी सरल सुकुमार, फिकिर मोहिं काहे की। [3]
भृकुटी नित तकत ब्रह्म जाकी,
ताकी शरणाई डर काकी,
जब ऐसी हमारी रखवार, फिकिर मोहिं काहे की। [4]
जो आरत ‘मम स्वामिनि!’ भाखै,
तेहि पुतरिन सम आँखिन राखै।
जब ऐसी ‘कृपालु’ रिझवार, फिकिर मोहिं काहे की॥ [5]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी, प्रेम रस मदिरा, प्रकीर्ण-माधुरी (21)
जब किशोरी जी हमारी स्वामिनी हैं, तब मुझे किस बात की चिन्ता है? [1]
हित अधम उधारन देह धरें,
बिनु कारन दीनन नेह करें,
जब ऐसी दया दरबार, फिकिर मोहिं काहे की। [2]
टुक निज-जन क्रन्दन सुनि पावें,
तजि श्यामहुँ निज जन पहँ धावें,
जब ऐसी सरल सुकुमार, फिकिर मोहिं काहे की। [3]
भृकुटी नित तकत ब्रह्म जाकी,
ताकी शरणाई डर काकी,
जब ऐसी हमारी रखवार, फिकिर मोहिं काहे की। [4]
जो आरत ‘मम स्वामिनि!’ भाखै,
तेहि पुतरिन सम आँखिन राखै।
जब ऐसी ‘कृपालु’ रिझवार, फिकिर मोहिं काहे की॥ [5]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी, प्रेम रस मदिरा, प्रकीर्ण-माधुरी (21)
जब किशोरी जी हमारी स्वामिनी हैं, तब मुझे किस बात की चिन्ता है? [1]
जो पतितों के उद्धार के लिए ही अवतार लेती हैं और अकारण ही दीनों से प्रेम करती हैं— जब हमारी स्वामिनी के दरबार में इतनी अपार दया है, तब मुझे किस बात की चिन्ता है? [2]
हमारी स्वामिनी जी अपने शरणागतों की थोड़ी-सी करुण पुकार सुनते ही अपने प्राणेश्वर श्यामसुन्दर को भी छोड़कर, अपने जन के पास तत्क्षण सुधि-बुधि भूल दौड़ी आती हैं। जब हमारी किशोरी जी इतनी सुकुमारी और सरल-स्वभाव वाली हैं, तब मुझे किस बात की चिन्ता है? [3]
ब्रह्म श्रीकृष्ण भी जिनकी भौंहों के संकेत निहारा करते हैं, अर्थात् प्यारे श्यामसुन्दर भी जिनकी आज्ञा से संचालित होते हैं, उनकी शरण में जाकर फिर किसका भय है? जब ऐसी स्वामिनी जी हमारी रक्षा करने वाली हैं, तब मुझे किस बात की चिन्ता है? [4]
जो शरणागत आर्त होकर दृढ़ निष्ठापूर्वक ‘मेरी स्वामिनी जी!’ ऐसा कह देता है, उसे स्वामिनी जी अपनी आँखों की पुतली के समान रखती हैं। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं— जब हमारी स्वामिनी जी शरणागत से इतना प्रेम करती हैं, तब मुझे किस बात की चिन्ता है? [5]

