आजु की बानिक प्यारे तेरी - श्री हरिदास, केलिमाल (29)

आजु की बानिक प्यारे तेरी - श्री हरिदास, केलिमाल (29)

(राग कान्हरौं)
आजु की बानिक प्यारे तेरी, प्यारी तुम्हारी बरनी न जाइ छबि।​ [1]
इनकी स्यामता, तुम्हारी गौरता, जैसे सित-असित बैनी, रही ज्यौं भुवंगम दबी॥​ [2]
इनकौ पीताम्बर, तुम्हारौ नील निचोल, ज्यों ससि कुंदन जेब रबि।​ [3]
श्री हरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी की,​सोभा बरनी न जाये, जो मिलें रसिक कोटि कवी॥ [4]

- श्री हरिदास, केलिमाल (29) 

सखी प्रिया-प्रियतम से कह रही है—

आज आप दोनों की ऐसी अद्भुत शोभा बनी है, जैसी कभी देखी न गई। इस छवि का यथार्थ वर्णन करना संभव नहीं। [1]

प्यारी जी! प्यारे की श्यामता आपकी गौरता में लीन होकर झलक रही है। प्रिय के अंगों का प्रतिबिम्ब प्यारी जी के अंगों में, और प्यारी जी के अंगों का प्रतिबिम्ब प्रिय के अंगों से प्रकट हो रहा है; मानो श्याम-वर्ण अंगों की श्यामलता ने गौर-वर्ण अंगों की गौरता को अपने में समेट लिया हो। [2]

प्यारे जी का श्रृंगार पीताम्बर है, और आपके कंचन-सदृश तन पर नीले रंग की ओढ़नी शोभायमान है। आपका मुख चन्द्रमा के समान शीतल और सुशोभित है, तथा ये विरह-रूप रवि मानो उसकी कान्ति को और भी निखार रहे हैं। [3]

हरिदासी सखी कहती है— मेरी स्वामिनी राधे जी की शोभा कैसी कहूँ? यद्यपि कुञ्जबिहारी की बिहार-लीला की शोभा का वर्णन करना ही संभव नहीं, तो बिहारिणी जी, जो कृपालुता की मूर्तिमयी राशि हैं, उनकी शोभा का वर्णन तो कोटि-कोटि रसिक सखीजन भी नहीं कर सकते। हरिदासी सखी कहती हैं— हम आप दोनों की उस सुन्दर छवि का, जो सुख की मूर्तिमयी राशि है, वर्णन भला कैसे कर सकते हैं? [4]