हम चाकर कुंज विहारिणि के।
डरत न डर रुक्मिणि वल्लभ अरु, श्री रुक्मिणि अवतारिणि के॥ [1]
मुक्ति चार मनुहार करत पै, जाऊँ न ढिंग जग तारिणि के।
नित्य - विहार लखौं गहवर वन, सरस रास - रस कारिणि के॥ [2]
बनि अलमस्त नाम गुन गाउँ, शरणागत - भय हारिणि के।
जूठनि खाऊँ ‘कृपालु’ जाऊँ बलि, नित नीलांबरधारिणि के॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा मधुरी (52)
हम तो निकुञ्ज-विहारिणी स्वामिनी के ही दास हैं; रुक्मिणीवल्लभ श्यामसुन्दर तथा लक्ष्मी-अवतार श्री रुक्मिणी के भय से भी नहीं डरते। [1]
डरत न डर रुक्मिणि वल्लभ अरु, श्री रुक्मिणि अवतारिणि के॥ [1]
मुक्ति चार मनुहार करत पै, जाऊँ न ढिंग जग तारिणि के।
नित्य - विहार लखौं गहवर वन, सरस रास - रस कारिणि के॥ [2]
बनि अलमस्त नाम गुन गाउँ, शरणागत - भय हारिणि के।
जूठनि खाऊँ ‘कृपालु’ जाऊँ बलि, नित नीलांबरधारिणि के॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा मधुरी (52)
हम तो निकुञ्ज-विहारिणी स्वामिनी के ही दास हैं; रुक्मिणीवल्लभ श्यामसुन्दर तथा लक्ष्मी-अवतार श्री रुक्मिणी के भय से भी नहीं डरते। [1]
संसार-सागर से तारने वाली चारों प्रकार की मुक्तियाँ भी हमारी खुशामद करती रहती हैं, किन्तु हम भूलकर भी उनकी ओर नहीं फटकते। सरस रास-रस बरसाने वाली किशोरी जी की नित्य-विहार लीला का गह्वरवन में नित्य दर्शन करते रहते हैं। [2]
शरणागत के भय को दूर करने वाली लाड़ली जी के नाम और गुणों का गान करते हुए हम मतवाले बने रहते हैं। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं— मैं तो नीलाम्बर-धारिणी वृषभानुनन्दिनी राधिका की झूठन (महाप्रसाद) खाकर बलिहार जाता हूँ। [3]

