जुगल प्रेम रस मगन जे - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (30, 31)

जुगल प्रेम रस मगन जे - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (30, 31)

जुगल प्रेम रस मगन जे, तेई अपनैं मानि।
सब बिधि अंतर खोलि कै, तिनिहीं सौं रुचि मानि। [1]
इहि रस परसयौ नाहिं जिनि, तू जिनि परसै ताहि।
तासौं नातौ नाहिं कछु, यह रस रुचै न जाहि॥ [2]

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (30, 31)
 

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं— युगल किशोर श्री श्यामाश्याम के प्रेम-रस में जो मग्न है, उसी को अपना मानो। हृदय में हर प्रकार से, बिना किसी भेद अथवा छिपाव के, उसी से अपना प्रेम मानो। [1]

जिसे इस रस ने स्पर्श नहीं किया, अर्थात् जो इस रस-मार्ग से अनभिज्ञ हैं, उनके संसर्ग से बचना चाहिए। जिन्हें इस रस में तनिक भी रुचि नहीं, उनसे हमारा कोई संबंध नहीं है। [2]