युगल रस वृन्दावन बरसे - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेमरसमदिरा, युगलमाधुरी (4)

युगल रस वृन्दावन बरसे - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेमरसमदिरा, युगलमाधुरी (4)

युगलरस, वृन्दावनबरसे।
रसिक - शिरोमणि, इन्द्रनीलमणि, कौस्तुभमणिसरसे॥ [1]
मनि - रमनीराधागजगमनी, कमनीमनहरसे ।
हावनभावननृत्यलुभावन, गावनमधुस्वरसे॥ [2]
रसमयहासन - परिहासनयुत, रासनमनकरषे ।
लाड़लिलाल 'कृपालु' दुहुँनदुहुँ, डालबाँहगरसे॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेमरसमदिरा, युगलमाधुरी (4)

दिव्य वृन्दावन में श्यामा-श्याम का दिव्य प्रेम-रस बरस रहा है। रसिकों के शिरोमणि, इन्द्रनील-मणि के समान कान्तिवाले, कौस्तुभ-मणि धारण किए हुए श्यामसुन्दर नितान्त मनोहारी हैं। [1]

समस्त स्त्रियों में मणि-स्वरूपा, मतवाले गजराज-सी चाल वाली किशोरी जी श्यामसुन्दर से भी अधिक मनोहारिणी हैं। दोनों दिव्य हाव-भावों से युक्त होकर मधुराति-मधुर स्वरों में गाते हुए नित्य रास में नृत्य करते हैं। [2]

दोनों दिव्य रसमय हास-परिहास से युक्त होकर रास में सबका मन आकर्षित करते हैं। ‘जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज’ कहते हैं— मुझे तो वह झाँकी सबसे बाँकी लगती है, जब प्रिया-प्रियतम दोनों गले में बाँह डाले सुशोभित होते हैं। [3]