(कवित्त)
श्री राधारानी के पग पग पर प्रयाग।
जहाँ केशव की केलि-कुञ्ज, कोटि-कोटि काशी है॥ [1]
यमुना में जगन्नाथ, रेणुका में रामेश्वर।
तरु-तरु पे पड़े रहत, अयोध्या निवासी हैं॥ [2]
गोपिन के द्वार पर, हरिद्वार बसत जहाँ।
बद्री, केदारनाथ, फिरत दास-दासी हैं॥ [3]
तो स्वर्ग, अपवर्ग हम लेकर करेंगे क्या।
जान लो हमें हम वृन्दावन वासी हैं॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (29)
एक वृंदावन वासी, वृंदावन की महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं कि श्री राधा रानी जहाँ-जहाँ चलती हैं, वहाँ-वहाँ प्रयाग का स्वरूप बन जाता है। जिन कुंजों में श्री राधा-कृष्ण क्रीड़ा करते हैं, वहाँ अनंत कोटि काशी का वास है। [1]
श्री यमुना जी में जगन्नाथ का निवास है। ब्रज की रज में रामेश्वर का वास है, और वृंदावन के वृक्षों में अयोध्या के निवासी सूक्ष्म रूप में रहते हैं। [2]
गोपियों के द्वार पर हरिद्वार बसा हुआ है। इतना ही नहीं, बद्रीनाथ और केदारनाथ भी यहाँ राधा-कृष्ण के दास और दासी के रूप में निवास करते हैं। [3]
इसलिए हम स्वर्ग, अपवर्ग या कहीं और जाकर क्या करेंगे, हम तो वृंदावन वासी हैं। [4]
श्री राधारानी के पग पग पर प्रयाग।
जहाँ केशव की केलि-कुञ्ज, कोटि-कोटि काशी है॥ [1]
यमुना में जगन्नाथ, रेणुका में रामेश्वर।
तरु-तरु पे पड़े रहत, अयोध्या निवासी हैं॥ [2]
गोपिन के द्वार पर, हरिद्वार बसत जहाँ।
बद्री, केदारनाथ, फिरत दास-दासी हैं॥ [3]
तो स्वर्ग, अपवर्ग हम लेकर करेंगे क्या।
जान लो हमें हम वृन्दावन वासी हैं॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (29)
एक वृंदावन वासी, वृंदावन की महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं कि श्री राधा रानी जहाँ-जहाँ चलती हैं, वहाँ-वहाँ प्रयाग का स्वरूप बन जाता है। जिन कुंजों में श्री राधा-कृष्ण क्रीड़ा करते हैं, वहाँ अनंत कोटि काशी का वास है। [1]
श्री यमुना जी में जगन्नाथ का निवास है। ब्रज की रज में रामेश्वर का वास है, और वृंदावन के वृक्षों में अयोध्या के निवासी सूक्ष्म रूप में रहते हैं। [2]
गोपियों के द्वार पर हरिद्वार बसा हुआ है। इतना ही नहीं, बद्रीनाथ और केदारनाथ भी यहाँ राधा-कृष्ण के दास और दासी के रूप में निवास करते हैं। [3]
इसलिए हम स्वर्ग, अपवर्ग या कहीं और जाकर क्या करेंगे, हम तो वृंदावन वासी हैं। [4]

