श्री शनिदेव जी - सर्वश्रेष्ठ कृष्ण भक्त

श्री शनिदेव जी - सर्वश्रेष्ठ कृष्ण भक्त

कोकिला वन के समीप श्री शनिदेव जी विराज मान हैं। आपका दर्शन भक्ति प्रद है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार श्री शनिदेव जी आप सदैव ही श्री कृष्ण के चिंतन में मग्न रहते है। कभी झलक उठाकर के किसी की और ना देखना ही आप का नियम था।

एक बार भगवती जगदंबा ने पुत्र श्री गणेश को जन्म दिया। इस अवसर पर बड़े-बड़े देवता (देवगण) बधाई देने पहुंचे। वहाँ श्री शनिदेव जी भी आए हुए थे। तो माता ने श्री शनिदेव जी से पूछा की श्री शनिदेव जी तुम जब से आए हो नीचे मुँह करके ही खड़े हो तुम मेरे पुत्र को बधाई क्यों नहीं दे रहे हो। श्री शनिदेव जी बोले माता मेरी दृष्टि अमंगलकारी है।

पार्वती जी ने पूछा ऐसा क्यों कहते हो तब श्री शनिदेव जी ने उत्तर दिया की माता मैं बाल्यकाल से श्री कृष्ण भगवान की भक्ति कर रहा हूँ। श्री कृष्ण के अतिरिक्त वो किसी को एक झलका भी नहीं देखते थे ना बोलना चाहते थे। संसार से एकदम विरक्त थे। परंतु पिता ने चित्ररथ की सुयोग्य कन्या से मेरा विवाह कर दिया और हर पत्नी अपने पति से समागम की इच्छा तो रखती है। मेरी इस पर बिल्कुल सहमति ना देख उसने मुझे श्राप दिया कि आप मेरी ओर नहीं देखते हो अतः आप जिसकी भी और देखेंगे तत्क्षण वह नष्ट हो जाएगा। तत्पश्चात पार्वती जी श्री शनिदेव जी की बात सुन कर हंसने लगी और बोली कुछ भी हो तुम्हें मेरे पुत्र की और देखना होगा। जो भी हो मेरी आज्ञा का पालन करो। 

श्री शनिदेव जी ने जैसे ही अपनी दृष्टि डाली तुरंत उस बालक का मस्तक अपने आप उड़कर गोलोक चला गया। जगदंबा की गोद मैं रक्त से लथपथ पुत्र का धड़ पड़ा था। तभी श्री हरि एक गजराज का मस्तक लाए और धड़ से जोड़ दिया और बालक फिर से जीवित हो गया। और वही बालक सभी देवों में पूजनीय हुआ पार्वती जी ने श्री शनिदेव जी को श्राप दे दिया कि जाओ तुम अंगहीन हो जाओ किंतु श्री शनिदेव जी वैसे के वैसे ही प्रसन्न अवस्था में खड़े रहे, यही है श्री कृष्ण भक्त की पहचान हर परिस्थिति में वह प्रसन्न रहते है। ऐसा कहा गया है। कि श्री शनिदेव जी से उत्तम श्री कृष्ण भक्त कोई नहीं है। श्री कृष्ण भक्त होने के कारण ही आप ब्रज में पूजनीय हैं। यद्यपि आज लोगों की मानसिक स्थिति कुछ बदल गई है जो आप को एक ग्रह के रूप में देखते हैं और आपके वास्तविक स्वरुप श्री कृष्ण भक्ति से वह परिचित नहीं है।