मान सरोवर - दिव्य लीला

मान सरोवर - दिव्य लीला


एक बार श्री राधा रानी रास-लीला के मध्य एक उदास मनोदशा (मान) में थीं । रास-लीला वृन्दावन धाम में मनोहर जगह हो रही थी। मान की लीला में उन्होंने रास लीला का त्याग कर, यमुना को पार करके वो एक एकांत वन में आ गई। श्री राधा रानी ने श्री कृष्ण के वियोग में आंसू बहाये। उनकी आँखों से आंसू बहने लगी और उन आसुओं से एक कुंड बन गया और इसका नाम मानसरोवर हो गया । श्री कृष्ण भी व्याकुल हो कर, श्री राधा रानी को ढूंढते हुए इस सरोवर पर पहुंचे। वे अपनी बांसुरी और अपने मस्तक को श्री राधा रानी के कोमल चरणों में रख कर अपनी भूल स्वीकारते हैं और आश्वासन देते हैं कि वह फिर से ऐसा नहीं करेंगे।
ब्रज में यह आकर्षक स्थान मोर, कोकिला, हंस, हिरण और अन्य पक्षी और पशुओं तथा पीलू, कदंब और तमाल के वृक्ष और उनकी छाया से सुशोभित है। यह दृश्य इस वन में आज भी आँखों को मोहित करता है और दिव्य युगल श्री राधा रानी और श्री कृष्ण की रास-लीला की स्मृति दिलाता है।
मान सरोवर के किनारे एक बहुत पुराना मंदिर है। जिसमे एक चित्र मैं श्री कृष्ण, श्री राधा रानी के मान अवस्था को दूर करने के लिए अपनी बांसुरी और मस्तक, श्री राधा रानी के कमल स्वरुप चरणों में रख देते है। ये चित्र अभी भी इस मंदिर मैं लगा हुआ है।
श्री कृष्ण कहते हैं "सामरा-गरेला-धनदानाम-ममा शिरासि मंडनं देहि पढा-पल्लवं उदारम " - आपके चरणों से दूरी के कारण मेरे हृदय की ज्वाला शांत नहीं हो रही, कृपया आप अपने कमल रुपी चरण मेरे सर पर रखिये और मेरे मस्तक की शोभा बढ़ाइए"।
यह स्थान यमुना जी की दूसरी ओर है, धीर समीर से एक कच्चा रास्ता है, जहाँ से यमुना जी को पार करके जाया जा सकता है।