श्याम हौं कब ह्वैहौं ब्रजधूरि।
ह्वै ब्रजधूरि अंग लपटैहौं, उर आनँद भरपूरि॥ [1]
जेहि ब्रजरस कहँ रसिकन मानत, प्रान सजीवन मूरि।
जेहि पावन रज पावन कहँ विधि, भाग मनावत भूरि॥ [2]
जेहि लगि बने लतन तरु ज्ञानिन, त्यागि समाधिन दूरि।
धूरि धूसरित तोहिँ ‘कृपालु’ कब, अतनु लखैगो घूरि॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (88)
हे श्यामसुन्दर ! मैं कब ब्रज – धूलि बनूँगा ? ब्रज – धूलि बनकर, आनन्द विभोर होकर तुम्हारे अंग – अंग में कब लिपटूँगा ? [1]
जिस ब्रज – धूलि को रसिक लोग प्राण संजीवनी मानते हैं, जिस पवित्र धूलि को पाने के लिए ब्रह्मा भिखारी बन कर अपने भाग्य की सराहना करता है। [2]
जिस ब्रज – धूलि को पाने के लिए परमहंस लोग अपनी समाधि को छोड़कर लता – वृक्ष बने हुए हैं। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि वह दिन कब आयेगा जब मैं वह धूलि बनकर तुम्हें धूलि - धूसरित करूँगा एवं तुम्हारे शरीर को शंकर जी का शरीर समझकर कामदेव की तरह तुम्हारी ओर घूर कर देखूंगा। [3]
ह्वै ब्रजधूरि अंग लपटैहौं, उर आनँद भरपूरि॥ [1]
जेहि ब्रजरस कहँ रसिकन मानत, प्रान सजीवन मूरि।
जेहि पावन रज पावन कहँ विधि, भाग मनावत भूरि॥ [2]
जेहि लगि बने लतन तरु ज्ञानिन, त्यागि समाधिन दूरि।
धूरि धूसरित तोहिँ ‘कृपालु’ कब, अतनु लखैगो घूरि॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (88)
हे श्यामसुन्दर ! मैं कब ब्रज – धूलि बनूँगा ? ब्रज – धूलि बनकर, आनन्द विभोर होकर तुम्हारे अंग – अंग में कब लिपटूँगा ? [1]
जिस ब्रज – धूलि को रसिक लोग प्राण संजीवनी मानते हैं, जिस पवित्र धूलि को पाने के लिए ब्रह्मा भिखारी बन कर अपने भाग्य की सराहना करता है। [2]
जिस ब्रज – धूलि को पाने के लिए परमहंस लोग अपनी समाधि को छोड़कर लता – वृक्ष बने हुए हैं। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि वह दिन कब आयेगा जब मैं वह धूलि बनकर तुम्हें धूलि - धूसरित करूँगा एवं तुम्हारे शरीर को शंकर जी का शरीर समझकर कामदेव की तरह तुम्हारी ओर घूर कर देखूंगा। [3]

