नित सेवा मांगूँ श्यामा श्याम तेरी - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 1 (97)

नित सेवा मांगूँ श्यामा श्याम तेरी - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 1 (97)

नित सेवा मांगूँ श्यामा श्याम तेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ मैं!
बढ़ें भक्ति निष्काम नित मेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ मैं! [1]
तोहिं पतित जनन ही प्यारे हैं, हम अगनित पापन वारे हैं!
पुनि कत कर एतिक बेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ मैं! [2]
यदि कह उन लइ शरणाइ रे, कहू कत पूतना गति पाई रे!
अब बेर न करू करू चेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ में! [3]
ये भली है बुरी है जो है तेरी है, तुम भी सोचो सचमुच यह मेरी है!
सोचत ही बनि जाय मेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ में! [4]
तेरी इच्छा में इच्छा बनाती रहूं, तेरे सुख में ही सुख नित पाती रहूं!
बस चाह इहै इक मेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ में! [5]
बिनु हेतु कृपालु कहाते हो, पुनि क्यों साधन करवाते हो!
सुनु विनय "कृपालु" जू मेरी, न भुक्ति नाहीं मुक्ति मांगूँ में! [6]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 1 (97)

हे श्री श्यामाश्याम, मैं नित्य आप से आपकी सेवा ही मागूंगा, न भुक्ति न ही मुक्ति मागूंगा मैं।
नित्य मेरे हृदय मे निष्काम भक्ति बढ़ती रहे, न भुक्ति न ही मुक्ति मागूंगा मैं। [1]

हे श्री श्यामा श्याम, आपको पतित ही प्यारे हैं, मैं तो अनगिनत पाप करने वाला हूँ।
हे श्री श्यामा श्याम, तब क्यूँ आप कृपा करने मे इतनी देर कर रहे हैं, न भुक्ति न ही मुक्ति मागूंगा मैं। [2]

यदि आप कहेंगे की जिसने मेरी शरण ग्रहण कर ली, उसका मैं उद्धार करता ही हूँ, तो पूतना ने कब आपकी शरण ग्रहण की जो आपने उसे परम गति प्रदान की।
हे श्री श्यामाश्याम, अन देर ना कीजिये, मुझे अपनी दासी बना लीजिये, न भुक्ति न ही मुक्ति मागूंगा मैं। [3]

मैं तो जो भी हूँ, भली या बुरी, लेकिन आपकी ही हूँ, आप भी मुझे अपना मान लीजिये।
हे श्री श्यामाश्याम, "यह मेरी है" आपके ऐसा सोचते ही मेरा काम बन जाएगा, न भुक्ति न ही मुक्ति मागूंगा मैं। [4]

हे श्री श्यामाश्याम, हर क्षण आपकी ही इच्छा मानु, और आपके ही सुख में सुख पाती रहूँ।
बस इतनी सी यही चाह है मेरी, न भुक्ति न ही मुक्ति मागूंगा मैं। [5]

हे श्री श्यामाश्याम, आप अकारण कृपा करनेवाले कहाते हो, फिर क्यूँ मुझसे इतना साधन करवा रहे हो।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं "हे श्री श्यामाश्याम, मेरी यह विनती सुन लीजिये, न भुक्ति न ही मुक्ति मागूंगा मैं। [6]