कुसुम-सरोवर के दक्षिण-पूर्व से चार सौ मीटर की दूरी पर नारद-कुंड है। जहाँ श्री नारदजी तपस्या करते थे। वृंदा देवी से नारद जी ने गोपी-भाव की महानता सुनी, तब श्री नारदजी के अंतहकरण (मन) में श्री राधा कृष्ण( दिव्य युगल स्वरुप) की गोपी भाव से प्रेम करने की तीव्र इच्छा प्रकट हुई। अब श्री नारदजी ने अपनी उपासना गोपी भाव से शुरु कर दी।
लंबे समय तक ऐसा करने के बाद, योगमाया ने श्री नारदजी को कुसुम-सरोवर में डुबकी लगवाई जिसकी वजह से उन्हें गोपी का स्वरुप प्राप्त हुआ । इसके बाद, वह दिव्य युगल की सेवा करने योग्य हो गए। नारद-कुंड का दर्शन अवशय ही लाभकारी और हितकारी है।

