तो पै वारी वारी बरसाने वारी प्यारी - ब्रज रस माधुरी, जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज 1 (37)

तो पै वारी वारी बरसाने वारी प्यारी - ब्रज रस माधुरी, जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज 1 (37)

तो पै वारी वारी बरसाने वारी प्यारी ।
हे बरसानेवाली श्री प्यारी जू, मैं आप पर वारी वारी जाता हूँ।

बरसाने वारी, बरसाने वारी प्यारी॥
हे बरसानेवाली श्री प्यारी जू।

तो पै वारी वारी वारी बनवारी प्यारी ।
हे श्री प्यारी जू, बनवारी श्री कृष्ण आप पर वारी वारी जातें हैं।

वाके पाछे पिए डोलें जोई बोले प्यारी॥
हे श्री प्यारी जू, आप जिसे कहती हैं उसके पीछे श्री कृष्ण डोलने लगते हैं।

कर ते मुरली गिरे, लखि छवि प्यारी ।
हे श्री प्यारी जू, आपके छवि का दर्शन करते ही श्री कृष्ण के हाथ से मुरली गिरने लगती है।

जय हो जय हो पिय बोलें, पाछे चलें प्यारी॥
हे श्री प्यारी जू, श्री कृष्ण आपकी जय जयकार करते एवं आपके पीछे पीछे चलते हैं।

देयं बुहारी पिय महलन प्यारी ।
हे श्री प्यारी जू, श्री कृष्ण आपके महल मे सोहनी सेवा करते हैं।

प्रेम भिखारी पिय दाता मेरी प्यारी॥
हे श्री प्यारी जू, श्री कृष्ण आपके समक्ष प्रेम के भीकारी हैं एवं आप प्रेम की दाता हो।

रोतो रोतो ढूंढे कुञ्ज कुञ्ज पिय प्यारी ।
हे श्री प्यारी जू, श्री कृष्ण रोते रोते आपको कुंज निकुंजों मे ढूंढते हैं।

पिय सखी पग परे रूठी लखि प्यारी॥
हे श्री प्यारी जू, श्री कृष्ण आपको मानिनी रूप मे देखते हैं, तो सखियों से आपको मनाने की याचना करते हैं।

पिय दे बुहारी गह्वरवन प्यारी ।
हे श्री प्यारी जू, श्री कृष्ण गह्वर वन मे बुहारी करते हैं, जहां आप विहार करती हैं।

तेरा नाम तो है बड़ा तुझसे भी प्यारी।
हे श्री प्यारी जू, आपसे बड़ा आपका नाम है, जीसे सुनते ही श्री कृष्ण अधीर हो जाते हैं।

नाम के अधीन रहे नामी तू भी प्यारी॥
हे श्री प्यारी जू, आप भी अपने नाम के अधीन हैं।

सुकुमारी ऊँचे महल वारी प्यारी ।
हे उचें महलों वाली श्री प्यारी जू, आप अति सुकुमारी हैं।

नीलो रंग तनु प्यारो नीलो पट प्यारी॥
हे श्री प्यारी जू, श्री कृष्ण के अंग का वर्ण नीला है इसी कारण आप नीले वस्त्र धारण करती हैं।

पीलो रंग पट प्यारो, पीलो रंग प्यारी ।
हे श्री प्यारी जू, आपके अंग का वर्ण पीला है इसी कारण श्री कृष्ण पीले वस्त्र धारण करते हैं।

बढ़ो नटखट प्यारो, बड़ी भोरी प्यारी॥
हे श्री प्यारी जू, आप अति भोरी हैं एवं श्री प्यारे जू बहुत नटखट हैं।

- ब्रज रस माधुरी, जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज  1 (37)