प्रथम सुनें भागवत - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (36)

प्रथम सुनें भागवत - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (36)

(छप्पय)
प्रथम सुने भागवत, भक्त मुख भगवत वाणी। [1]
द्वितीय अराधे भक्ति, व्यास नव भांति बखानी॥ [2]
तृतीय करे गुरु समुझी, दक्ष सर्वज्ञ रसीलो। [3]
चौथे होई विरक्त, बसे वनराज जसि॥ [4]
पांचे भूले देह सुध, छठी भावना रास की। [5]
सातै पावे रीति रस श्री स्वामी हरिदास की॥ [6]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (36)

सबसे पहले किसी भगवद भक्त के मुख से श्रीमद्भागवत, श्री भगवद्गीता, सत्शास्त्र आदि का श्रवण करे। [1]

दूसरे चरण में व्यास जी द्वारा बताई गई नवधा भक्ति (श्रवणम्, कीर्तनम्, स्मरणम्, वन्दनम्, अर्चनम्, पादसेवनम्, दास्यम्, सख्यम् एवं आत्मनिवेदनम् ) का अभ्यास करे। [2]

तीसरे चरण में ऐसे सतगुरु के चरणों में आत्म समर्पण करे जो सर्वज्ञ हो और रसिक हो। [3]
 
चौथे चरण में संसार से अनासक्त हो विरक्त हो जाये और श्री धाम वृंदावन में वास करे। [4] 

पाँचवे चरण में साधना करते हुए देह सुधि को भूल जाए अर्थात स्त्री पुरुष के भेद से ऊपर उठ जाए। छठे चरण में दिव्य प्रेम-चेतना युक्त साधक श्री कृष्ण के दिव्य प्रेम को प्राप्त करने के लिए योग्य हो जाता है जैसे गोपियों को महारास लीला में श्री कृष्ण का पूर्ण प्रेम प्राप्त हुआ था। [5]

श्रीमद्भागवतम के अनुसार, महारास दिव्य प्रेम का अंतिम चरण है। लेकिन वृंदावन के रसिक संत श्री भगवद रसिक कहते हैं कि अभी और है जो अंतिम चरण है। सबसे ऊपर और अंतिम गति, जो बहुत ही दुर्लभ है जिसे श्री स्वामी हरिदास जी ने प्रदर्शित किया है जहाँ दिव्य वृंदावन में श्री राधारानी की निकुंज में निज सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। यह सर्वोच्च पद श्री किशोरी जी की अहेतु की कृपा से मात्र सौभाग्यशाली रसिक ही प्राप्त कर पाएं हैं। [6]