भाव भक्ति के नौ लक्षण - रूप गोस्वामी

भाव भक्ति के नौ लक्षण - रूप गोस्वामी

क्षान्तिर् अव्यर्थ-कालत्वं विरक्तिर् मान-शुन्यता ।
आशा-बन्धः समुत्कण्ठा नाम-गाने सदा रुचिः ॥१.३.२५॥
आसक्तिस् तद्-गुणाख्याने प्रीतिस् तद्-वसति-स्थले ।
इत्य् आदयो’नुभावाः स्युर् जात-भावाङ्कुरे जने ॥१.३.२६॥

- भक्ति रसामृत सिंधु, श्रील रूप गोस्वामी

श्री रूप गोस्वामी भाव भक्ति पर पहुंचे हुए जीवों के लक्षण बताए हैं। यह लक्षण हर उस जीव में पाए जाते हैं जो भाव भक्ति पर पहुंच जाता है, यह नौ प्रकार के लक्षण इस प्रकार हैं:

1) क्षान्ति: सहनशीलता । अत्यंत कष्ट एवं दुखद परिस्थिति में भी शांति एवं सहनशीलता बनाए रखना ।
2) अव्यर्थ-कालत्वं: समय का सदुपयोग। हर समय केवल श्री राधा रानी और श्री कृष्ण एवं गुरुदेव के वचनों एवं सेवा का ही स्मरण बना रहे और बिल्कुल भी समय का दुरुपयोग ना हो।
3) विरक्ति: वैराग्य। इंद्रिय संतुष्टि की वस्तुओं के प्रति पूर्ण उदासीनता।
4) मान-शुन्यता: झूठी प्रतिष्ठा का अभाव, स्वयं में मान न चाहना। इतनी विनम्रता हो की अपने में मान चाहने की भावना ही न हो।
5) आशा-बन्धः हर समय आशा बंध रहना अर्थात हर क्षण अनुभव करना कि श्री राधा कृष्ण मुझ पर कृपा अवश्य करेंगे।
6) समुत्कण्ठा: अपना लक्ष्य अर्थात श्री राधा कृष्ण की सेवा प्राप्त करने की सर्वोच्च उत्कंठा।
7) नाम-गाने सदा रुचिः अपने इष्ट देव अर्थात श्री राधा कृष्ण का नाम इतना अधिक प्रिय लगे कि उसको गाने एवं रटन की नित्य रुचि हो ।
8) आसक्तिस् तद्-गुणाख्याने : अपने प्रभु के गुणों का गान करने  एवं वर्णन करने की भीतर से प्रगाढ़ आसक्ति हो।
9) प्रीतिस् तद्-वसति-स्थले: भगवान के धाम जैसे श्री वृंदावन धाम से एवं वृंदावन वास करने की प्रीति हो। 

इन 9 लक्षणों से अपने आप को माप लेना चाहिए कि हम भाव भक्ति पर पहुंचे हैं या नहीं और अगर नहीं पहुंचे तो अभी बहुत साधना करने की आवश्यकता है।