लखो रे मन, वृंदा विपिन-बहार - प्रेम रस मदिरा, धाम माधुरी, पद-3

लखो रे मन, वृंदा विपिन-बहार - प्रेम रस मदिरा, धाम माधुरी, पद-3

लखो रे मन, वृंदा विपिन-बहार।
जहँ विहरति वृषभानुनन्दिनी, छविनिधि नंदकुमार।
जहँ चिन्मय सब जीव चराचर, जहँ राधे सरकार।
जहँ बसंत ऋतू वास करत नित, भ्रमर करत गुंजार।
जहँ विकसत नित कुंद केवड़ा, कर्णिकार कचनार।
जहँ केकी कोकिला कीर नित, राधे नाम उचार।
जहँ ‘कृपालु’ जलजा-प्रवेश नहिं, निगम न पावत पार।

- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, धाम माधुरी (3)

अर्थात रसिक संत श्री कृपालुजी महाराज कहते हैं कि अरे मन दिव्य वृन्दावन की अलौकिक बहार देख, जहाँ पर प्रिया-प्रियतम नित्य ही विहार करते हैं। जहाँ जड़-चेतन समस्त जीव चिन्मय हैं, जहाँ की महारानी राधा ठकुरानी हैं, जहाँ नित्य ही बसंत ऋतू का निवास है तथा जहाँ खिले हुए कुन्द, केवड़ा, कर्णिकार, कचनार आदि फूलों पर भौंरे गुंजार किया करते हैं। जहाँ मोर, कोयल, तोते आदि भी निरन्तर ‘राधे-राधे’ पुकारा करते हैं। जहाँ महालक्ष्मी का भी प्रवेश नहीं है एवं जहाँ वेदों की भी गति नहीं है।