​परसौली गाँव , ब्रज - दिव्य लीला  एवं सूर कुटि

​परसौली गाँव , ब्रज - दिव्य लीला एवं सूर कुटि

परासौली श्री कृष्ण की वसंत रास लीला की भूमि है और उनकी प्रिय गोपियों का प्रिय स्थान है। यह रास ब्रह्मा जी की सम्पूर्ण रात्री काल तक चलती रही । आकाश में चंद्रमा इस रास लीला को देखने पर स्तंभित रह गए थे और पूरी रास की अवधि के लिए सरोवर में छिप गए और महारास का दर्शन करते रहे, इसलिए इस स्थान को चंद्र सरोवर भी कहा जाता है। सरोवर के दक्षिण-पश्चिमी कोने में श्रृंगार मंदिर है जहाँ श्री कृष्ण ने श्री राधा रानी का श्रृंगार किया था।
भगवान कृष्ण ने यहां 5 शिलाओं को प्रकट कीं;
1. सुंदर शिला [गिरिराज मुखारविंद]।
2. दण्डवती शिला [श्री कृष्ण ने इस गिरिराज शिला को दण्डवत प्रणाम किया]।
3. सिन्दूरी शिला [श्री कृष्ण ने इस शिला से सिन्दूर लिया और श्री राधारानी के मांग में सिन्दूर भरा]।
4. काजल शिला
5. बाजनी शिला

सरोवऱ के पास एक चकोर वृक्ष के नीचे श्री वल्लभाचार्य की आसन स्थली है जिसे सूर-कुंड और सूर-समाधी के रूप में जाना जाता है। श्री सुरदास जी का कुंड और समाधि भी इसी क्षेत्र में है।

श्री सूरदास जी कि दिव्य रचनाओं को आज भी स्मरण किया जाता है जो एक दिव्य कवि थे। उन्होंने "सूरदास" की छाप से एक लाख पदों की रचना की और श्री श्यामसुंदर ने "सूर श्याम" के छाप से 25000 पदों की रचना की। यह 1.25 लाख पद सुर-सागर या सूर-पदावली नामक पुस्तक में संकलित है।। जबकि वह अंधे थे, वह कविताओं की रचना करते थे और श्री नाथ जी के रूप और श्रृंगार और सजावट कर वर्णन करते थे।

एक दिन, पुजारी जी श्रीनाथजी को वस्त्र पहनाना भूल गए, और उन्हे पूरी तरह नग्न छोड़ दिया। उन्होंने जैसे ही पट खोला और श्री नाथ की सजावट का वर्णन करने के लिए श्री सूरदास जी से कहा,  कुछ क्षणों के लिए श्री सूरदास चुप रहे, लेकिन पुजारी ने ज़ोर दिया की आप बताइये आज उन्होंने क्या पहना है । श्री सूरदास जी अंधे होते हुए भी श्रीनाथजी का पूर्ण दिव्य श्रृंगार देख लेते थे। श्री सूरदास ज़ोर से हँसे और बोले, "आज भये हरि नन्गम नंगा" - आज, हरि नग्न हैं। सभी उपस्थित इस बात को सुनकर दंग रह गए थे और हसने लगे।

श्री सूरदास ने यहीं श्रीमद्भागवत का पारायण किया था। उन्होंने अपने आखिरी के दिन परासौली में बिताए । एक दिन, श्री वल्लभाचार्य जी के पुत्र श्री विट्ठलनाथ जी ने उनसे पूछा, "सूर, आप किस बारे में सोच रहे हैं?"

तब श्री सूरदास ने अपना आखिरी पद बनाया :
"खन्जन नैन रूप रस माते,
अतिशय चारु चपल अनीयारे पल पिनजर न समाते"


श्री कृष्ण के सुंदर नयन खन्जन पक्षियों की तरह हैं। वे रस से परिपूर्ण हैं, बहुत चंचल हैं, और नशे के कारण लाल रंग के दिखाई दे रहे हैं । मेरे प्राण अब इस शरीर में बंधे नहीं रह सकते।"
यह कह कर, उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया। श्री विठ्ठलाचार्य ने कहाँ , "पुष्टी-मार्ग की नाव आज चली गई है"।

परासौली के दक्षिण-पूर्वी भाग में शंकरषण-कुंड है, जिसके तट में श्री बलदेव का मंदिर भी है। परासौली गाँव गोवेर्धन में स्थित है।

स्थान:
परसौली गाँव गोवर्धन के निचले इलाकों में गोवर्धन शहर के दक्षिण-पूर्व में लगभग एक-चौथाई मील की दूरी पर स्थित है।