मेरी महारानी श्री राधारानी।
जाके बल मैं सब सों तोरी, लोक वेद कुल कानि॥ [1]
प्राण जीवन धन लाल बिहारी कौ, बारि पियत नित पानी।
भगवत रसिक सहायक सब दिन, सर्वोपरि सुखदानी॥ [2]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (38)
वृंदावन निकुंज की अधीश्वरी श्री राधारानी ही मेरी एकमात्र स्वामिनी हैं। इन्हीं के बल पर मैंने लोक, वेद और कुल की सभी मर्यादाओं का त्याग कर दिया है। [1]
श्री बिहारी जी की प्राणधन और सर्वस्व केवल किशोरी जी ही हैं। वे उन पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं। भगवत रसिक जी कहते हैं — जो रसिकों (प्रियतम एवं सहचरियों) की सदा सहायता करती हैं और उन्हें निरंतर सर्वोच्च सुख प्रदान करती हैं, वह एकमात्र श्री किशोरी जी ही हैं। [2]
जाके बल मैं सब सों तोरी, लोक वेद कुल कानि॥ [1]
प्राण जीवन धन लाल बिहारी कौ, बारि पियत नित पानी।
भगवत रसिक सहायक सब दिन, सर्वोपरि सुखदानी॥ [2]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (38)
वृंदावन निकुंज की अधीश्वरी श्री राधारानी ही मेरी एकमात्र स्वामिनी हैं। इन्हीं के बल पर मैंने लोक, वेद और कुल की सभी मर्यादाओं का त्याग कर दिया है। [1]
श्री बिहारी जी की प्राणधन और सर्वस्व केवल किशोरी जी ही हैं। वे उन पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं। भगवत रसिक जी कहते हैं — जो रसिकों (प्रियतम एवं सहचरियों) की सदा सहायता करती हैं और उन्हें निरंतर सर्वोच्च सुख प्रदान करती हैं, वह एकमात्र श्री किशोरी जी ही हैं। [2]

