नेह नागरी दास जी - ब्रज के रसिक संत

नेह नागरी दास जी - ब्रज के रसिक संत

जन्म:
नेह नागरीदास का जन्म सन. १५९० के लगभग मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्रान्तर्गत बेरछा नामक गाँव के एक सम्पन्न पँवार क्षत्रिय परिवार में हुआ था।

आध्यात्मिक जीवन:
बाल्यावस्था से ही भगवद्भक्ति और साधु सेवा में इनकी रुचि थी । एक बार राधावल्लभीय महात्मा चतुर्भुजदास, जो मध्यप्रदेश के ही गढ़ा नामक गाँव के निवासी थे, सन्त-मण्डली सहित इनके गाँव में पधारे । उनके सत्संग से ये प्रेमोपासना की ओर आकृष्ट हुए।

वृन्दावन आगमन:
श्री चतुर्भुजदास जी के सत्संग के प्रभाव से श्री नेह नगरीदास जी घर-बार त्यागकर वृन्दावन चले गए। साथ में इनकी कृपापात्री ओरछा की रानी भागमती भी गई। वहाँ जाकर दोनों राधावल्लभ आचार्य गोस्वामी वनचन्द्र जी से दीक्षा लेकर रस-साधना में प्रवृत्त हो गये।
उन्होंने अपना परिचय कुछ इस प्रकार दिया है।

"सुन्दर श्री बरसानो निवास और बास बसों श्री वृन्दावन धाम है।
देवी हमारे श्री राधिका नागरी गोत सौं श्री हरिवंश नाम है॥
देव हमारे श्रीराधिकावल्लभ रसिक अनन्य सभा विश्राम है।
नाम है नागरीदासि अली वृषभान लली की गली को गुलाम है॥”

बरसाना आगमन:
श्री हितहरिवंश की वाणी तथा आराध्ययुगल के नित्य-विहार में इनकी अगाध आस्था थी। ये प्रतिदिन हितवाणी के किसी एक पद को उठा लेते और अहर्निश उसीकी भावना में मग्न रहते थे। हितवाणी के आगे इनको रासलीला तथा श्रीमद्भागवत की कथा भी फीकी लगती थी। इसलिए उसमें सम्मिलित होने से प्रायः विरत रहते थे। वृन्दावन के कुछ रसभक्तिहीन उपासक इनके इस व्यवहार की आलोचना करते थे।
एक बार की बात है, गोस्वामी वनचंद्र जी के पुत्र श्री नागरवर गोस्वामी राधावल्लभ जी के मन्दिर में भागवत की कथा कह रहे थे। विरोधियों ने उनसे नागरीदास के कथा में सम्मिलित न होने की शिकायत की। इस पर नागरवर जी ने नागरीदास को बुलाकर कहा, 'आजकल दशम-स्कन्ध की कथा चल रही है। इसे तो आपको अवश्य श्रवण करना चाहिए। गुरु पुत्र की आज्ञा शिरोधार्य कर उस दिन नागरीदास जी कथा-मण्डप में उपस्थित हुए। धेनुकासुर-वध का प्रसंग चल रहा था। कथा में जैसे ही श्रीकृष्ण द्वारा धेनुकासुर के सहायक गधों का पैर पकड़ कर पटकने का वृत्तान्त सुना, ये अकुलाकर उठ खड़े हुए और उसी झोंक में बाहर चले गये। इनके इस आचरण से वहाँ उपस्थित सभी लोग खिन्न हो गये। दूसरे दिन जब गोस्वामी नागरवरजी ने इन्हें बुलाया और शपथ देकर कथा मण्डप से अकस्मात् उठ जाने का कारण पूछा तो ये बोले - 'उस समय मैं श्री हिताचार्य के एक पद की भावना में लीन था, जिसमें श्यामसुन्दर मानवती श्री राधा का सुन्दर चिबुक सहलाकर मनुहार कर रहे थे।

आजु निकुंज मंजु में खेलत, नवल किशोर नवीन किसोरी।
हरि उर मुकुर बिलोकि अपनपौ, विभ्रम विकल मानजुत भोरी॥
चिबुक सुचारु प्रलोइ प्रबोधित, पिय प्रतिबिंब जनाइ निहोरी।
नेति नेति वचनामृत सुनि सुनि, ललितादिक देखति दुरि चोरी।
हित हरिवंश करत कर धूनन, प्रणय कोप मालावलि तोरी॥


इसी बीच मेरे कानों में भगवान द्वारा धेनुकासुर के सहयोगी गधों के पैर पकड़ कर पटके जाने के शब्द पड़े। मन में विचार आया कि प्रिया की सुकोमल ठोढ़ी सहलाने वाले नागर के हस्त-कमल में गधे की टाँग कैसे शोभा देगी --

चिबुक सुचारु प्रलोइ प्रबोधित,
तिनकर गदहनि पग क्यों सोभित।


अप्रत्याशित व्यवधान से मेरी मानसी भावना खंडित हो गई और मैं उद्विग्न होकर बाहर चला गया। इस स्पष्टीकरण से नागरीदास जी की उच्च आध्यात्मिक स्थिति का संधान पाकर गोस्वामी नागरवर जी ने इन्हें हृदय से लगा लिया। इसके बावजूद निंदकों ने इनका पीछा नहीं छोड़ा। अत: खिन्न होकर ये वृन्दावन छोड़कर राधा जी की लीलास्थली बरसाने चले गये। निंदकों के द्वेषपूर्ण आचरण से उत्पन्न निराशा और असहायता की यथार्थ अभिव्यक्ति इनकी निम्नांकित साखी में मिलती है --

जिनके बल निधरक हुते, तेइ बैरी भये बान।
तरकस के सर साँप ह्वै, फिरि-फिरि लागे खान॥


बरसाने में इन्होंने गहवरवन की पहाड़ी पर अपनी कुटी बनाई जो आज मोर कुटी के नाम से प्रसिद्ध है।

श्री राधारानी दर्शन:
कहा जाता है कि एक दिन यहीं सखियों सहित श्री राधाजी ने इन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया। स्वामिनी के तेजोमय दिव्यरूप पर दृष्टि पड़ते ही ये मूच्च्छित हो गये । इसी स्थिति में इन्होंने राधा जी को यह कहते सुना --

भूखे हैं हम आधी रैन, या बिरिया ख्वावै तब चैन।
बरसाने में अस्थल करौ, मेरी बरसगाँठ उर धरौ॥

(मैं नित्य प्रति यहाँ खेलने आती हूँ। आधीरात के समय हमें भूख लग जाती है। इस समय यदि कुछ खिलावो तो शान्ति मिले। बरसाने में मेरा मन्दिर बनावो और नियमित रूप से मेरी वर्षगाँठ का आयोजन करो।)

नागरीदास जी ने परम हर्षित हो राधाजी को अर्द्धरात्रि में भोजन कराया और निशीथ-भोग (खीर और पूड़ि) के इस नियम का आजीवन निर्वाह करते रहे। राधाजी ने उस समय दूसरी बात बरसाने में अपना मन्दिर बनवाकर प्रति वर्ष जन्मोत्सव मनाने की कही थी। इसके परिपालनार्थ नागरीदास जी ने अपनी कृपापात्री रानी भागमती के सहयोग से वहाँ श्रीराधा-मन्दिर का निर्माण कराया और बड़ी धूमधाम से राधाष्टमीपर्व मनाने की परंपरा स्थापित की जो अब तक अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है।

ग्रंथ रचना:
नेह नागरीदास की रचनाओं को विषयानुसार तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है - सिद्धान्त दोहावली (छन्द सं ९३५), रस पदावली (छंद सं. २३२) तथा पदावली (छंद सं १०२)। इनमें क्रमशः श्री हित हरिवंश का यशोगान तथा उनके द्वारा प्रतिपादित भक्ति-सिद्धान्त का निरूपण, आराध्य युगल की विहारलीला, रास, वृन्दावन एवं बरसाना की महिमा, मन-प्रबोधन आदि विषयों का भावपूर्ण निरूपण किया गया है।
अपने व्यक्तित्व तथा कृतित्व द्वारा श्री हित हरिवंश गोस्वामी सम्प्रदाय को सुव्यवस्थित रूप देने वाले महात्माओं में नागरीदास जी का नाम अग्रगण्य है। महात्मा ध्रुवदास और चाचा वृन्दावनदास ने इनका स्मरण निष्ठावान भक्त के रूप में किया है।