भक्तिरसामृत सिन्धु में श्रील रूपगोस्वामी, भक्ति के क्रमिक विकास का वर्णन करते हुए कहते हैं कि:-
आदौ श्रद्धा ततः साधुसंगोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात्तत्तो निष्ठा रुचिस्ततः।।
अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाऽभ्युदञ्चति। साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः।।
- श्रील रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.4.15- 1.4.16)
अर्थातः- सर्वप्रथम श्रद्धा अर्थात शास्त्र वचनों में विश्वास होता है, उसके बाद साधु-संग होता है, फिर भजन क्रिया प्रारम्भ होती है, भजन क्रिया के बाद अनर्थ-निवृति, फिर निष्ठा, फिर रूचि, तदनन्तर आसक्ति और फिर भाव का उदय होता है । उसके बाद प्रेम प्राप्त होता है रसिक गुरु की शरण में रहकर, तदनन्तर जीव कृत कृत हो जाता है, एवं श्री भगवान् के धाम पहुँचता है।
आदौ श्रद्धा ततः साधुसंगोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात्तत्तो निष्ठा रुचिस्ततः।।
अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाऽभ्युदञ्चति। साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः।।
- श्रील रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.4.15- 1.4.16)
अर्थातः- सर्वप्रथम श्रद्धा अर्थात शास्त्र वचनों में विश्वास होता है, उसके बाद साधु-संग होता है, फिर भजन क्रिया प्रारम्भ होती है, भजन क्रिया के बाद अनर्थ-निवृति, फिर निष्ठा, फिर रूचि, तदनन्तर आसक्ति और फिर भाव का उदय होता है । उसके बाद प्रेम प्राप्त होता है रसिक गुरु की शरण में रहकर, तदनन्तर जीव कृत कृत हो जाता है, एवं श्री भगवान् के धाम पहुँचता है।

