कुंजबिहारी हौं तेरी बलाइ - केलिमाल, श्री हरिदास (12)

कुंजबिहारी हौं तेरी बलाइ - केलिमाल, श्री हरिदास (12)

(राग कान्हरौ)
कुंजबिहारी हौं तेरी बलाइ
लेऊँ नीके हौ गावत।
राग रागिनीन के जूथ उपजावत॥
तैसीयै तैसी मिली जोरी
प्रिया जू की मुख देखत चंद लजावत।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कौ
नृत्य देखत काहि न भावत॥

- श्री हरिदास, केलिमाल (12)

कुंजबिहारी की भावना है प्यारी जी आप मुझे अंग संग कर कुंजों विहार कर रही हैं , मैं आप की बलायें यानि बलिहारी पर लेता हूँ, आप अपनी कृपालुता बरसाती रहें , आप इसी भांति रहें , बोलें , गाती रहें। आप के आलिंगन से अनेक मनोरथ पूर्ण होते हैं , नये उपजते भी उपजते हैं। सखी बोली - प्रिया जी की मुख चन्द्र के आगे लाल जी का मुख चन्द्र फीका प्रतीत हो रहा है। प्रिया जी के अंग के सम्मुख प्रिय का अंग दब गया है या कहीं छिप गया है। हरिदासी सखी यहाँ सुख विलास रति में किन का नृत्य विशेष है , दर्शाना चाह रही हैं। श्री श्यामा जी का नृत्य श्वास है , यह सुन श्री श्याम जी प्रसन्नता से बोल पड़े , आप की कृपा से श्यामा प्यारी जी नृत्य कर रही हैं , सो मैं बलि बलि जाऊँ।