श्यामा श्याम शरण गहु रे मन।
युगल माधुरी ध्यान धरे उर, गाउ नाम गुन रहु वृंदावन॥
सखीभाव संतन अनुगत ह्वै, प्रेम सुधा पिवु लहु जीवनधन।
ह्वै निष्काम धाम-निष्ठा गहि, गहवर वन विचरहु गोवर्धन॥
भरि भरि अंक लतन आनँद जल, झरझर झरि लावहु जनु सावन।
इमि ‘कृपालु’ मदमत रैन दिन, नित नव रस चाखहु मनभावन॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धान्त माधुरी (101)
अरे मन ! तू राधा-कृष्ण के चरण-कमलों की शरण में जा, तथा राधा-कृष्ण का स्वरूप अपने हृदय में रखकर उनके विविध नाम गुणादिकों को प्रेम-विभोर होकर गाता हुआ निरन्तर वृन्दावन में ही निवास कर । [1]
प्रेम प्राप्त सखी भावयुक्त महापुरुषों की शरण होकर उस दिव्य प्रेमामृत का पान कर, जो तेरे जीवन का सर्वस्व है । निष्काम भाव रखते हुए श्री कृष्णधाम में चिन्मय दृष्टि रखकर गह्वरवन एवं गोवर्धन में घूमते हुए विचरण कर । [2]
ब्रज की लताओं का बार-बार आलिंगन करके नेत्रों से आनन्द के आँसुओं की श्रावण की तरह झड़ी लगाते हुए वर्षा कर । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – इस प्रकार तू प्रेम-रस में उन्मत होकर दिन-रात नित्य-प्रति नवीन-नवीन दिव्य रसों का मनमाना आस्वादन कर । [3]
युगल माधुरी ध्यान धरे उर, गाउ नाम गुन रहु वृंदावन॥
सखीभाव संतन अनुगत ह्वै, प्रेम सुधा पिवु लहु जीवनधन।
ह्वै निष्काम धाम-निष्ठा गहि, गहवर वन विचरहु गोवर्धन॥
भरि भरि अंक लतन आनँद जल, झरझर झरि लावहु जनु सावन।
इमि ‘कृपालु’ मदमत रैन दिन, नित नव रस चाखहु मनभावन॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धान्त माधुरी (101)
अरे मन ! तू राधा-कृष्ण के चरण-कमलों की शरण में जा, तथा राधा-कृष्ण का स्वरूप अपने हृदय में रखकर उनके विविध नाम गुणादिकों को प्रेम-विभोर होकर गाता हुआ निरन्तर वृन्दावन में ही निवास कर । [1]
प्रेम प्राप्त सखी भावयुक्त महापुरुषों की शरण होकर उस दिव्य प्रेमामृत का पान कर, जो तेरे जीवन का सर्वस्व है । निष्काम भाव रखते हुए श्री कृष्णधाम में चिन्मय दृष्टि रखकर गह्वरवन एवं गोवर्धन में घूमते हुए विचरण कर । [2]
ब्रज की लताओं का बार-बार आलिंगन करके नेत्रों से आनन्द के आँसुओं की श्रावण की तरह झड़ी लगाते हुए वर्षा कर । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं – इस प्रकार तू प्रेम-रस में उन्मत होकर दिन-रात नित्य-प्रति नवीन-नवीन दिव्य रसों का मनमाना आस्वादन कर । [3]

