हमारो माई, श्री बरसानो गाम ।
महरानी राधा ठकुरानी, सरस सुखद अभिराम ।
गहवर – वन वृषभानुकुंड वर, प्रेमसरोवर ठाम ।
विधि हरि हर दुर्लभ रजधानी, श्री वृंदावन धाम ।
विहरत निज स्वामिनि सँग कुंजनि, पुंजनि आठों याम ।
डगर बुहारत पंथ निहारत, रहत ब्रह्म घनश्याम ।
छके ‘कृपालु’ प्रेम रस डोलत, लै लै राधे नाम॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा धाम माधुरी (5)
भावार्थ – अरी माई ! मेरा तो ग्राम बरसाना है । राधा ठकुरानी जो प्रेम की निधि एवं आनन्द की खान हैं, वे ही हमारी महारानी हैं । यहाँ गह्वरवन, वृषभानुकुण्ड एवं प्रेम – सरोवर आदि दिव्य स्थान हैं । ब्रह्मा, विष्णु, शंकर से भी अप्राप्य श्री वृन्दावन धाम हमारी राजधानी है । जहाँ हम किशोरी जी के साथ दिन – रात विविध कुंजों में रास का रसास्वादन करते रहते हैं । ब्रह्म श्रीकृष्ण ही वहाँ किशोरी जी के लिये झाड़ू लगाते हुए मार्ग साफ करते हैं तथा उनकी प्रतीक्षा करते हैं । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हम भी ‘राधे, राधे’ कहते हुए प्रेम – रस – में उन्मत्त वहाँ डोला करते हैं ।
महरानी राधा ठकुरानी, सरस सुखद अभिराम ।
गहवर – वन वृषभानुकुंड वर, प्रेमसरोवर ठाम ।
विधि हरि हर दुर्लभ रजधानी, श्री वृंदावन धाम ।
विहरत निज स्वामिनि सँग कुंजनि, पुंजनि आठों याम ।
डगर बुहारत पंथ निहारत, रहत ब्रह्म घनश्याम ।
छके ‘कृपालु’ प्रेम रस डोलत, लै लै राधे नाम॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा धाम माधुरी (5)
भावार्थ – अरी माई ! मेरा तो ग्राम बरसाना है । राधा ठकुरानी जो प्रेम की निधि एवं आनन्द की खान हैं, वे ही हमारी महारानी हैं । यहाँ गह्वरवन, वृषभानुकुण्ड एवं प्रेम – सरोवर आदि दिव्य स्थान हैं । ब्रह्मा, विष्णु, शंकर से भी अप्राप्य श्री वृन्दावन धाम हमारी राजधानी है । जहाँ हम किशोरी जी के साथ दिन – रात विविध कुंजों में रास का रसास्वादन करते रहते हैं । ब्रह्म श्रीकृष्ण ही वहाँ किशोरी जी के लिये झाड़ू लगाते हुए मार्ग साफ करते हैं तथा उनकी प्रतीक्षा करते हैं । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हम भी ‘राधे, राधे’ कहते हुए प्रेम – रस – में उन्मत्त वहाँ डोला करते हैं ।

