(राग सारंग)
वृंदावन रस मोहि भावे हो ।
ताकि हौं बलि जाऊं सखी री, जो कोई मोहि सुनावे हो॥
वेद पुरान और भारत भाखै, सो मोहि कछु ना सुहावे हो ।
मन वच कर्म समृति हूँ, कहत है मेरे मन न आवै हो॥
कृष्ण कृपा तब ही भलें जानौ, रसिक अनन्य मिलावे हो ।
व्यास दास तेहि बड़भागी जिनके हिय यह आवै हो॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (118)
श्री हरिराम व्यास जी (श्री विशाखा अवतार), वृन्दावन रस की महिमा का बखान करते हुए बताते हैं कि मुझे केवल वृन्दावन रस ही सुहाता है। मैं बार बार उन पर बलिहारी जाता हूँ, जो वृन्दावन रस की चर्चा करते हैं। किसी प्रकार का सांसारिक कर्म तो दूर परन्तु वेद, शास्त्र एवं उनके भाष्य जिनमें राधा कृष्ण का वृन्दावन रस न झलके, उनमें भी मेरी रूचि नहीं है। यह रस चर्चा का विषय नहीं परन्तु अनुभव रूप है। साक्षात श्री कृष्ण की कृपा तभी मानना, यदि कोई रसिक जीवन में आये एवं वृन्दावन रस के विषय में बताये। बहुत ही दुर्लभ एवं भाग्यशाली वह जीव हैं जिनके हृदय में यह वृन्दावन रस प्रकट हो गया है।
वृंदावन रस मोहि भावे हो ।
ताकि हौं बलि जाऊं सखी री, जो कोई मोहि सुनावे हो॥
वेद पुरान और भारत भाखै, सो मोहि कछु ना सुहावे हो ।
मन वच कर्म समृति हूँ, कहत है मेरे मन न आवै हो॥
कृष्ण कृपा तब ही भलें जानौ, रसिक अनन्य मिलावे हो ।
व्यास दास तेहि बड़भागी जिनके हिय यह आवै हो॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (118)
श्री हरिराम व्यास जी (श्री विशाखा अवतार), वृन्दावन रस की महिमा का बखान करते हुए बताते हैं कि मुझे केवल वृन्दावन रस ही सुहाता है। मैं बार बार उन पर बलिहारी जाता हूँ, जो वृन्दावन रस की चर्चा करते हैं। किसी प्रकार का सांसारिक कर्म तो दूर परन्तु वेद, शास्त्र एवं उनके भाष्य जिनमें राधा कृष्ण का वृन्दावन रस न झलके, उनमें भी मेरी रूचि नहीं है। यह रस चर्चा का विषय नहीं परन्तु अनुभव रूप है। साक्षात श्री कृष्ण की कृपा तभी मानना, यदि कोई रसिक जीवन में आये एवं वृन्दावन रस के विषय में बताये। बहुत ही दुर्लभ एवं भाग्यशाली वह जीव हैं जिनके हृदय में यह वृन्दावन रस प्रकट हो गया है।

