बलि जाउँ निकुंज लतान की ।
अलि कुल संकुल विपुल सुफूलनि, लतनि तरुनि लिपटान की ।
नैन कुरंग तरंग तरंगिणि, कुँवरि भूप वृषभान की ।
रति रस सरस केलि रस लंपट, सुंदर श्याम सुजान की ।
मणि गण किरण कदंबनि भूषण, दामिनि दुति उनमान की ।
लखत ‘कृपालु’ अनूपम जोरी, प्रेम सुधा रस खान की॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, निकुंज माधुरी (17)
भावार्थ – मैं विविध प्रकार की लताओं के कुंजों की बार–बार बलैया लेता हूँ । मैं वृक्षों में लिपटी हुई लता एवं लताओं में फूले हुए विविध प्रकार के फूल तथा फूलों पर मँडराते हुए भौंरों के झुण्ड़ों की बार – बार बलैया लेता हूँ । मृगों के नेत्रों के समान चंचल तरंगों से युक्त मृगनयनी वृषभानुनन्दिनी की बार – बार बलैया लेता हूँ । लोकातीत प्रेम की अन्तरंग लीलाओं के माधुर्य में उन्मत्त रसिक – शिरोमणि श्यामसुन्दर की बलैया लेता हूँ । अंधकार में भी विविध प्रकार की मणियों से जटित गहनों के प्रकाश की बिजली के समान चमक की बार – बाए बलैया लेती हूँ । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि प्रेम के अमृत के रस की सार – स्वरूपा प्रिया – प्रियतम की अनोखी जोड़ी को देखते हुए बार – बार बलिहार जाता हूँ ।

