रंगीली राधा रसिकन प्रान - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा,  श्री राधा माधुरी (33)

रंगीली राधा रसिकन प्रान - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (33)

रंगीली राधा रसिकन प्रान |
सरस किशोरी की रसबोरी, भोरी मृदु मुसकान ||
सुबरन बरन गौर तनु सुबरन, नील बरन परिधान |
कनकन मुकुट लटनि की लटकनि, भृकुटिन कुटिल कमान ||
कनकन कंकन कनकन किंकिनि, कनकन कुंडल कान ||
लखि लाजत श्रृंगार लाड़लिहिं, कहँ लौं करिय बखान |
होत ‘कृपालु’ निछावर जापर, सुंदर श्याम सुजान ||

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा,  श्री राधा माधुरी (33)

रंगीली राधा रसिकों को प्राण के समान प्रिय हैं। रसमयी किशोरी जी की प्रेम रस से सरोबार भोली सी मुस्कान अत्यन्त ही मधुर है। किशोरी जी की देह का रंग सुवर्ण के रंग के समान अत्यन्त सुन्दर है। वे नीले रंग की साड़ी पहने हुए हैं। सुवर्ण के मुकुट, घुँघराले केशो की लटक एवं धनुष के समान टेढ़ी भौहें नितांत कमनीय हैं। हाथ में सुवर्ण के कंकण, कमर में सुवर्ण की किंकिणी एवं कानों में सुवर्ण के कुंडल मन को बरबस लुभा रहे हैं। कहाँ तक कहें किशोरी जी की श्रृंगार माधुरी को देखकर स्वयं श्रृंगार भी लज्जित हो रहा है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि सबसे बड़ी बात तो यह है कि त्रिभुवन मोहन मदन मोहन भी स्वयं किशोरी जी के हाथों बिना दाम के बिके हुए हैं।