बसे रे मेरे, नैनन दोउ सरकार - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

बसे रे मेरे, नैनन दोउ सरकार - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

बसे रे मेरे, नैनन दोउ सरकार |
गरबाहीं दीने रँग – भीने, छीने छवि – श्रृंगार |
रस मुरली ने अस सुख दीने, कीने बस ब्रजनार |
हँसनि दसन, दृग फँसनि गँसनि अस, रसनि कस न बलिहार |
दै सरबस बरबस रस – बस ह्वै, बस रस – रास मझार |
जित ‘कृपालु’ चितवति तित तिनहिंन, चितवति गति – मतिहार ||

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा
 
भावार्थ – मेरी आँखों में युगल – सरकार बस गये हैं। परस्पर गलबाहीं दिये हुए प्रेम रस सराबोर छवि एवं श्रृंगार की भी छवि को चुरा रहे हैं। मधुर मुरली की सुरीली तान ने ब्रजांगनाओं को इतना सुख दिया है कि वे सब आत्मविस्मृत हैं। उनके मन्द – मन्द हँसने एवं नुकीले नेत्रों के कटाक्ष के रस के वशीभूत होकर ऐसा कौन जीव है जो उस रस में बलिहार न जाय। जो बलिहार गया, अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया, पुन: युगल सरकार के कृपाकटाक्ष से उस रस के वशीभूत हो सर्वदा नित्य रास में अलौकिक रस पाता है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं सखी जिस ओर भी देखती हैं श्यामसुन्दर एवं किशोरी जी को देखती हैं और मन – बुद्धि से जगत् की चेतना से परे दिव्य चेतना युक्त रसपान करती हैं।