(राग सारंग)
बलि बलि जाऊँ राधा मोहिं रहन दै वृंदावन की सरन ।
मोकौ ठौर न और कहूं, अब सेऊंगौ ये चरन ॥ [1]
सहचरी ह्वै तेरी सेवा करिहुँ, पहिराऊँ आभरन ।
अति उदार अंग अंग माधुरी, रोम रोम सुख करन ॥ [2]
देखौं केलि बेली मंदिर में, सुनी किंकिनि रव श्रवण ।
दीजै वेगि व्यास कौ यह सुख, जहाँ न जीवन मरन ॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास (व्यास वाणी), पूर्वार्ध (292)
श्री हरिराम व्यास जी (विशाखा सखी अवतार) श्री राधारानी से प्रार्थना कर रहे हैं, हे किशोरीजी मैं आपकी बार बार बलिहार जा रहा हूँ, आप मुझे अपने निज महल वृन्दावन की शरण में ही रखिये।
आपके चरण कमल को छोड़कर मेरा न तो और कोई सहारा है और न ही कोई और निवास है। [1]
कब वो दिन आएगा जब आपकी कृपा से मैं आपकी सहचरी बनकर आपकी नित्य सेवा कर पाऊंगा और आपके आभूषण को आपको प्रेम पूर्वक पहनाउंगा।
आपके अति दिव्य अंगों की प्रेम पूर्वक सेवा पाकर, मेरा रोम रोम आनंदित हो उठेगा। [2]
आपकी निज केलि लीला को कब मैं आपके निज महल में देख सकूंगा और आपकी पायल एवं कमर में सुवर्ण की किंकिणी को सुन पाऊंगा।
हरिराम व्यास जी प्रार्थना कर रहे हैं कि आप जल्द ही मुझे अपनी नित्य सेवा प्रदान कीजिये जहाँ न जीवन है न मरण और एक क्षण का भी आपसे वियोग नहीं है, जिससे मैं आपकी प्रेम पूर्वक सेवा करने का सुख पा सकूँ। [3]
बलि बलि जाऊँ राधा मोहिं रहन दै वृंदावन की सरन ।
मोकौ ठौर न और कहूं, अब सेऊंगौ ये चरन ॥ [1]
सहचरी ह्वै तेरी सेवा करिहुँ, पहिराऊँ आभरन ।
अति उदार अंग अंग माधुरी, रोम रोम सुख करन ॥ [2]
देखौं केलि बेली मंदिर में, सुनी किंकिनि रव श्रवण ।
दीजै वेगि व्यास कौ यह सुख, जहाँ न जीवन मरन ॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास (व्यास वाणी), पूर्वार्ध (292)
श्री हरिराम व्यास जी (विशाखा सखी अवतार) श्री राधारानी से प्रार्थना कर रहे हैं, हे किशोरीजी मैं आपकी बार बार बलिहार जा रहा हूँ, आप मुझे अपने निज महल वृन्दावन की शरण में ही रखिये।
आपके चरण कमल को छोड़कर मेरा न तो और कोई सहारा है और न ही कोई और निवास है। [1]
कब वो दिन आएगा जब आपकी कृपा से मैं आपकी सहचरी बनकर आपकी नित्य सेवा कर पाऊंगा और आपके आभूषण को आपको प्रेम पूर्वक पहनाउंगा।
आपके अति दिव्य अंगों की प्रेम पूर्वक सेवा पाकर, मेरा रोम रोम आनंदित हो उठेगा। [2]
आपकी निज केलि लीला को कब मैं आपके निज महल में देख सकूंगा और आपकी पायल एवं कमर में सुवर्ण की किंकिणी को सुन पाऊंगा।
हरिराम व्यास जी प्रार्थना कर रहे हैं कि आप जल्द ही मुझे अपनी नित्य सेवा प्रदान कीजिये जहाँ न जीवन है न मरण और एक क्षण का भी आपसे वियोग नहीं है, जिससे मैं आपकी प्रेम पूर्वक सेवा करने का सुख पा सकूँ। [3]

