आज तृण टूटत है री, ललित त्रिभंगी पर - केलिमाल, स्वामी श्री हरिदास (18)

आज तृण टूटत है री, ललित त्रिभंगी पर - केलिमाल, स्वामी श्री हरिदास (18)

(राग कान्हरौ)
आज तृण टूटत है री, ललित त्रिभंगी पर |
चरन-चरन पर मुरली अधर धरैं, चितवनि बंक छबीली भू पर ||
चलहु न बेगि राधिका पिय पै, जो भयौ चाहत हौ सर्वोपर |
श्री हरिदास के स्वामी कौ समयौ अब, नीकौ बन्यौ,
हिल मिल केलि अटल रति भई धू पर ||

- स्वामी श्री हरिदास, केलिमाल (18)

कुंजमहल में विराजमान प्यारे पर प्यारी जी कृपा बरसा रही हैं। प्यार से कहती हैं - हे प्यारे !  मैं बिहारी बनूंगी और आप प्यारी बने । दोनों ने अपने रूप सज्जा वेष पलट लिए । इनकी शोभा सखी प्रिया रूप पिय से कहती हैं - प्रिया जी पिय बन ललित त्रिभंगी हो गई हैं । सखीजन त्रिभगता को शोभा देख बलि - बलि हो रही हैं । दष्टि बचाकर सखीगण तृण तोड रही है । प्रियतम प्यारी बने मानिनी हो रहे हैं । पियरूप प्यारी जी आतुर हो चरण पर चरण रख रही हैं तथा अधर पर मुरली धारण कर रखी है । नेत्रों को बाँके कर दुल्हिन बने पिय को वश में करना चाह रही हैं । चितवन को टेढ़े कर छबीली की शोभा वर्णातीत है ।प्यारी जी वेग से चलें । यहाँ राधिका जी पिय बनी आपका इन्तजार कर रही हैं । आपके मनोरथ मनोकामनापूर्ण अंगों से मिलकर बिहार करें, इसी कारण आप श्यामा बनी और वे श्याम बने । हरिदास की स्वामीनि श्यामा जी का समय अति उत्तम है , श्यामा श्याम बन बैठी हैं । आपके बिहार का समय हो रहा है , चाहत भी । केलि अटल हैं , पर आज रति अटल भई हैं ।