भगवत रसिक रसिक की बातें - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (4.6)

भगवत रसिक रसिक की बातें - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (4.6)

(राग धनाश्री)
तुब मुख चंद चकोर ये नैना। 
अति आरत अनुरागी लंपट भूल गई गति पलहु लगैना।।   
अरबरात मिलिबे कौं निसिदिन मिलेइ रहत मनु कबहुँ मिले ना।   
भगवत रसिक रसिक की बातें, रसिक बिना कोउ समुिझि  सकैना।।

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (4.6)

लाल जी प्रिया जी से कहते हैं कि ये नेत्र तो तुम्हारे मुखचंद के चकोर बन कर रह गए हैं | रूप रस लपंट ये (नयन चकोर) सदा तुम्हारे अनुराग से भरे रह कर तुम्हारे दर्शनों के लिए इतने अधीर बने रहते हैं कि इन्हे अपनी सहज वृत्ति का होश नहीं रहा रात दिन मिले रह कर भी मिलन के लिए ये ऐसे व्याकुल रहते हैं, मानों कभी मिले ही न हों | 
भगवतरसिक जी कहते हैं कि रसिक प्रियतम की ये बातें बडी गूढ़ हैं इनका तात्पर्य रसिक के अतिरिक्त कोई दूसरा समझ ही नहीं सकता |