मैं तो राधे राधे गाऊँ कालिंदी तट पे - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 1 (67)

मैं तो राधे राधे गाऊँ कालिंदी तट पे - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 1 (67)

मैं तो राधे राधे गाऊँ कालिंदी तट पे, वो तो भाजो चलो आवे रोतो वंशी वट पे।
मैं तो श्री यमुना तट पर बैठ राधे राधे गाऊँगी, श्री कृष्ण रोते रोते दौड़ते हुये वंशिवट पर आ जाएंगे।

मैं तो बावरी ह्वै नाचूँगी कालिंदी तट पै, मैं तो वारी वारी जाऊँ प्यारी जू के नीले पट पै ।
मैं तो सुध बुध खो कर बावरी बन श्री यमुना तट पर नाचूँगी, मैं तो श्री प्यारी जू के नीले पट पे वारी वारी जाती हूँ।

मैं तो वारी जाऊं प्यारी जू के दृगपट पे । मेरी प्यारी जू के बड़े ही रसीले लटके ।
मैं तो श्री प्यारी जू के नयन कमलों पर वारी वारी जाती हूँ, मेरी प्यारी जू की अलकें बड़े ही रसीले हैं, जिसमें से दिव्य रस का निर्झरण हो रह है।

मैं तो वारी प्यारी कारी घुँघरारी लट पै । राधे रानी के चरण मेरेे मन अटके ।
मैं तो श्री प्यारी जू की काली काली घुंगराली अलकों पर वारी जाती हूँ, मेरा मन तो श्री राधारानी के चरणों में अटका हुआ है।

मैं तो राधे की कहाऊं राधे राधे रट के । मैं तो प्यारे को चिढाऊँ राधे राधे रट के।
मैं तो राधे राधे रट के श्री राधे की ही कहाउंगी, मैं श्री प्यारे जू को राधे राधे रट के चिढ़ाउंगी।

मैं तो वारी जाऊँ पिय प्यारी खटपट पै। मेरी प्यारी न भुलावें कभू भूले भटके ।
मैं तो श्री श्यामाश्यम के खटपट पर वारी जाती हूँ, मेरी प्यारी जू अपने भूले भटके जनों को कभी नहीं भूलती हैं।

मेरी प्यारी पग पियहुँ मुकुट पटके । मैं तो प्यारी जो को पक्ष लेउँ बेखटके ।
मेरी प्यारी जू के चरणों मे श्री कृष्ण भी अपना मुकुट धर देते हैं, मैं तो बिना किसी भय के श्री प्यारी जू का ही पक्ष लेती हूँ।

मैं तो अकड़ के जाऊँ आगे नटखट के । मैं तो गारी देऊन ‘दारी’ के जो मोते अटके ।
मैं तो श्री राधारानी के बल अभिमानिनी बन अकड़ के श्री कृष्ण के समक्ष जाऊँगी, और यदि श्री कृष्ण थोड़ा भी मुझसे उलझेंगे तो मैं उनको गंदी गालियाँ भी दे दूँ।

मैं तो प्यारी जो की जय बोलूँ पनघट पै। प्यारी पग पिय आंसू टप टपके ।
मैं तो पनघट पे श्री प्यारी जू की जय जयकार करूंगी, मेरी प्यारी के चरणों मे प्यारे जू के आँसू टप टप कर गिरते हैं।

मैं तो वारी जाऊँ रोतो लखि नटखट पे । मेरो रोम रोम राधे नाम रस टपके ।
दोऊ एक हैं ' कृपालु ' मन जनि भटके ।
मैं तो श्री कृष्ण को प्रेम विह्वल रोते हुये देख वारी जाऊँगी, मेरे रोम रोम से श्री राधे नाम का रस टपक रहा है।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं "हे मन, श्री राधा कृष्ण दो नहीं बल्कि एक हैं, दो मान कर भ्रम मे न पड़ना।"

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 1 (67)