(कवित्त)
ऐसी हैं ललित प्यारी, लाल जू की प्रान प्यारी,
डीठहु न ठहराती कैसैं कै निहारियै। [1]
जाकी परछाईं पर कोटि कोटि चंद अरु,
दामिनी भामिनि काम कोटि कोटि वारियै॥ [2]
काजर की रेख जहाँ पाननि की पीक भारी,
और सुखुमारताई कैसें कै विचारियै। [3]
सहजि अंग अंग रूप सार मोद मई,
'हित ध्रुव' प्राण न्यौछावर कर डारिये॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (31)
श्री राधा रानी श्री लालजी अर्थात श्रीकृष्ण की प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। ठाकुरजी जब भी किशोरीजी की ओर दृष्टि डालते हैं, वह स्थिर नहीं रह पाती, फिसल जाती है। ऐसी रूप अगाधा श्री राधा को स्थिर भाव से निहारना संभव ही नहीं है। [1]
उनके साक्षात रूप की बात तो छोड़ो, उनकी परछाईं पर कोटि-कोटि चन्द्रमा, विद्युल्लता और कामभामिनी रति का सौंदर्य न्यौछावर है। [2]
जिनके नेत्रों में काजल है और श्री मुख को पान की पीक सुशोभित है, वह मानो नज़र हटती ही नहीं; इन सब सुकुमारताओं पर और कैसे विचार किया जाए। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि जहाँ-जहाँ दृष्टि पड़ती है, वहीं रस बरसता है। ऐसी प्यारी राधा रानी पर अपने प्राण न्यौछावर कर डालिये। [4]
ऐसी हैं ललित प्यारी, लाल जू की प्रान प्यारी,
डीठहु न ठहराती कैसैं कै निहारियै। [1]
जाकी परछाईं पर कोटि कोटि चंद अरु,
दामिनी भामिनि काम कोटि कोटि वारियै॥ [2]
काजर की रेख जहाँ पाननि की पीक भारी,
और सुखुमारताई कैसें कै विचारियै। [3]
सहजि अंग अंग रूप सार मोद मई,
'हित ध्रुव' प्राण न्यौछावर कर डारिये॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (31)
श्री राधा रानी श्री लालजी अर्थात श्रीकृष्ण की प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। ठाकुरजी जब भी किशोरीजी की ओर दृष्टि डालते हैं, वह स्थिर नहीं रह पाती, फिसल जाती है। ऐसी रूप अगाधा श्री राधा को स्थिर भाव से निहारना संभव ही नहीं है। [1]
उनके साक्षात रूप की बात तो छोड़ो, उनकी परछाईं पर कोटि-कोटि चन्द्रमा, विद्युल्लता और कामभामिनी रति का सौंदर्य न्यौछावर है। [2]
जिनके नेत्रों में काजल है और श्री मुख को पान की पीक सुशोभित है, वह मानो नज़र हटती ही नहीं; इन सब सुकुमारताओं पर और कैसे विचार किया जाए। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि जहाँ-जहाँ दृष्टि पड़ती है, वहीं रस बरसता है। ऐसी प्यारी राधा रानी पर अपने प्राण न्यौछावर कर डालिये। [4]

