सुरतरु, नागरी, नेह निधान - भगवत रसिक की वाणी, श्री भगवत रसिक, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (36)

सुरतरु, नागरी, नेह निधान - भगवत रसिक की वाणी, श्री भगवत रसिक, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (36)

(राग भैरव)
सुरतरु, नागरी, नेह निधान, स्यामा सरन मैं तेरी | [1]
अशरण - शरण हरन भव-बाधा साधा पुरवन मेरी || [2]
करुणाकर करुणा करि हेरौ, ढाई भरम कि ढेरी | [3]
भगवत जन की जानि बेदना, छेधन करौ सबेरी || [4]

- भगवत रसिक की वाणी, श्री भगवत रसिक, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (36)

हे लाड़ली जी आप ही केवल रसिकों के लिए कल्पलता हैं, चतुर शिरोमणि हैं, और प्रेम की निधि हैं। हे किशोरीजी मैं आपकी शरण में हूँ। [1]

अनाथों की रक्षक, भव बाधा का हरण करने वाली आप ही हैं, मेरी एक समस्त आशा एवं अभिलाषा आपसे ही है। [2]

कृपा कर के मेरे ऊपर स्नेह भरी दृष्टि दाल कर मेरे भ्रमों एवम भय को दूर कर दीजिये। [3]

भगवत रसिक जी कहते हैं कि आप से अधिक जीव की वेदना को कौन जान सकता है, कृपा करके आपकी भक्ति में आने वाली बाधा को आप जल्द दूर करो। [4]