जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चतुरासी पद (1)

जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चतुरासी पद (1)

(राग विभाग/ललित)
"जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे
भावे मोहि जोई सोई सोई करे प्यारे
मोको तो भावती ठौर प्यारे के नैनन में
प्यारो भयो चाहे मेरे नैनन के तारे
मेरे तन मन प्राण हु ते प्रीतम प्रिय
अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसो हारे
जय श्रीहित हरिवंश हंस हंसिनी सांवल गौर
कहो कौन करे जल तरंगिनी न्यारे”

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चतुरासी पद (1)

श्री हित चौरासी जी के इस प्रथम पद में श्री राधा, श्याम सुन्दर के हृदय और नेत्रों में विराजमान परस्पर अद्बुध प्रेम का संक्षिप्त एवं अत्यंत मार्मिक वर्णन श्री राधा के मुख से हुआ है। इस पद के वर्णन के समय श्री श्याम सुंदर किसी अन्य कुंज में पुष्प चयन के लिए गए हैं और यह एकांत अवसर देखकर हित सजनी श्री राधा से अपने प्रियतम के अद्बुध प्रेम की चर्चा करने लगती हैं। इस पद में श्री हिताचार्य ने श्री राधा के परम उदार स्वरुप का वर्णन बड़े ही सुन्दर ढंग से किया है। प्रिया जी ने कहा हे सखि, प्यारे श्री लाल जी जो भी कुछ करते हैं मुझे वह सभी प्रिय लगता है और मुझे जो कुछ प्रिय लगता है वह भी वही सब करते हैं। यदि मुझे केवल उनके ही नेत्रों में रहने योग्य सुहावना स्थल है तो वह भी मेरे नैनों की पुतलियां बन जाना चाहते हैं। सखि वह मुझे अपने तन मन और प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं, परंतु उन्होंने तो मुझ पर अपने कोटि-कोटि प्राण न्यौछावर कर दिए हैं। श्री राधा की प्रेम विभोरता से भावित श्री हित सजनी ने कहा - हे राधा कृष्ण श्यामल एवं गौर स्वरुप, आप दोनों वृन्दावन के हंस हंसिनी हैं। आप तो जल और तरंग की तरह एक ही हैं, आपको पृथक कौन कर सकता है।