(राग परज)
अहो विहारनि ललित लड़ैती, मम अपराध न मन में धारो ।
अपनी जानी मानी दासी वलि, कृपा विलोकनि नेक निहारो॥ [1]
श्रीवन कुञ्ज कुटीर कोन में, ललित किशोरी मौकों डारो ।
करुणा सिंधु अगाधे राधे, विगरी को अब वेगि सम्हारो॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (82)
हे ललित विहारिणी श्री राधा! मेरे अपराधों की ओर मत निहारना। मुझे अपनी दासी मान कर अपनी कृपा दृष्टि डालिए। [1]
मुझे श्रीवृन्दावन के किसी कुंज के कोने में वास दीजिए। हे अगाध कृपा करने वाली, करुणा-सागर श्री राधे! अब मेरी बिगड़ी को शीघ्र ही संवार दीजिए। [2]
अहो विहारनि ललित लड़ैती, मम अपराध न मन में धारो ।
अपनी जानी मानी दासी वलि, कृपा विलोकनि नेक निहारो॥ [1]
श्रीवन कुञ्ज कुटीर कोन में, ललित किशोरी मौकों डारो ।
करुणा सिंधु अगाधे राधे, विगरी को अब वेगि सम्हारो॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (82)
हे ललित विहारिणी श्री राधा! मेरे अपराधों की ओर मत निहारना। मुझे अपनी दासी मान कर अपनी कृपा दृष्टि डालिए। [1]
मुझे श्रीवृन्दावन के किसी कुंज के कोने में वास दीजिए। हे अगाध कृपा करने वाली, करुणा-सागर श्री राधे! अब मेरी बिगड़ी को शीघ्र ही संवार दीजिए। [2]

