भक्ति एक ऐश्वर्य अरु एक माधुर्य कहाय - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी

भक्ति एक ऐश्वर्य अरु एक माधुर्य कहाय - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी

भक्ति एक ऐश्वर्य अरु, एक माधुर्य कहाय।
पै नीरस ऐश्वर्य रस, ब्रज रसिकन न सुहाय॥

- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, भक्ति शतक (69)

दो प्रकार की भक्ति होती है—एक ऐश्वर्य से युक्त और एक माधुर्य-प्रेमरस से युक्त। ब्रज के रसिकों को ऐश्वर्य-भक्ति नहीं सुहाती, उन्हें केवल माधुर्य-रस भक्ति ही सुहाती है।