वृन्दावन दुतिपत्र की, उपमा कौं कछु नाहिं।
कोटि-कोटि बैकुंठ हूँ, तिहि सम कहे न जाहिं॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (13)
श्रीवृन्दावन धाम के किसी भी वृक्ष के एक लघु पत्र (पत्ते) की समता करना भी सर्वथा असम्भव है, क्योंकि करोड़ों वैकुण्ठों का ऐश्वर्य और वैभव भी उस एक पत्ते की दिव्य आभा के समक्ष तुच्छ प्रतीत होता है।
कोटि-कोटि बैकुंठ हूँ, तिहि सम कहे न जाहिं॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (13)
श्रीवृन्दावन धाम के किसी भी वृक्ष के एक लघु पत्र (पत्ते) की समता करना भी सर्वथा असम्भव है, क्योंकि करोड़ों वैकुण्ठों का ऐश्वर्य और वैभव भी उस एक पत्ते की दिव्य आभा के समक्ष तुच्छ प्रतीत होता है।

