वृन्दावन इहि विधि बसे तजि के सब अभिमान - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (87)

वृन्दावन इहि विधि बसे तजि के सब अभिमान - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (87)

वृन्दावन इहि विधि बसे, तजि के सब अभिमान।
तृण ते नीचौ आप कौं, जाने सोइ जान॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (87)

श्री वृन्दावन धाम में वास करने की यही विधि है कि मनुष्य अपने समस्त अहंकार का त्याग कर दे। जो स्वयं को तिनके से भी अधिक नीचा समझता है, वही वास्तव में यहाँ रहने का अधिकारी और सच्चा ज्ञानी है।