वृंदावन प्यारो अधिक - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (38)

वृंदावन प्यारो अधिक - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (38)

वृंदावन प्यारो अधिक, यातें प्रेम अपार।
जामें खेलती लाडली, सर्वसु प्राण आधार॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (38)

श्रीकृष्ण को श्री वृन्दावन अत्यन्त प्रिय है—उनका वृन्दावन से अपार अनुराग है, क्योंकि यहीं उनकी प्राणों से भी अधिक प्रिय लाड़ली श्री राधारानी यहाँ निरन्तर अपनी दिव्य क्रीड़ाएँ करती रहती हैं।