तीन लोक चौदह भुवन, प्रेम कहूँ ध्रुव नाहिं।
जगमग रह्यो जराव सौ, श्री वृन्दावन माहिं॥
- श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, प्रेमावली (51)
श्री ध्रुवदास कहते हैं कि तीन लोकों और चौदह भुवनों में सहज प्रेम के दर्शन कहीं नहीं होते। यह दिव्य प्रेम तो केवल श्रीवृन्दावन धाम में उसी प्रकार देदीप्यमान है, जैसे स्वर्ण (काञ्चन) में जड़ी हुई कोई बहुमूल्य मणि जगमगाती है।
जगमग रह्यो जराव सौ, श्री वृन्दावन माहिं॥
- श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, प्रेमावली (51)
श्री ध्रुवदास कहते हैं कि तीन लोकों और चौदह भुवनों में सहज प्रेम के दर्शन कहीं नहीं होते। यह दिव्य प्रेम तो केवल श्रीवृन्दावन धाम में उसी प्रकार देदीप्यमान है, जैसे स्वर्ण (काञ्चन) में जड़ी हुई कोई बहुमूल्य मणि जगमगाती है।

