प्रेम सरोवर प्रेम की, भरी रहे दिन रैन।
जहँ जहँ प्यारी पग धरत, श्याम धरत तहँ नैन॥
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी
ब्रज में प्रेम-सरोवर दिन-रात निरंतर प्रेम के रस से ही परिपूर्ण रहता है। जहाँ-जहाँ श्री प्रिया जी (राधा जी) अपने चरण कमल रखती हैं, वहीं-वहीं श्री श्यामसुन्दर अपनी पलकें और नयन बिछा देते हैं।
जहँ जहँ प्यारी पग धरत, श्याम धरत तहँ नैन॥
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी
ब्रज में प्रेम-सरोवर दिन-रात निरंतर प्रेम के रस से ही परिपूर्ण रहता है। जहाँ-जहाँ श्री प्रिया जी (राधा जी) अपने चरण कमल रखती हैं, वहीं-वहीं श्री श्यामसुन्दर अपनी पलकें और नयन बिछा देते हैं।

