“ निशि दिन रहे प्रेम में रागे | नहीं वे सोएं नहीं वे जागें ||
महल ते निकसि न बहार आवैं | कुञ्ज कुञ्ज प्रति खेल मचावै || ”
- श्री रसिक देव जी
राधारानी की सखी हमेशा दिव्य प्रेम में उन्मत्त रहती है। उसका मन वृंदावन में श्री राधारानी के निज महल में युगल रस से बाहर नहीं जाता है।
महल ते निकसि न बहार आवैं | कुञ्ज कुञ्ज प्रति खेल मचावै || ”
- श्री रसिक देव जी
राधारानी की सखी हमेशा दिव्य प्रेम में उन्मत्त रहती है। उसका मन वृंदावन में श्री राधारानी के निज महल में युगल रस से बाहर नहीं जाता है।

