जाके बल मैं सब सों तोरी - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (38)

जाके बल मैं सब सों तोरी - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (38)

“ जाके बल मैं सब सों तोरी, लोक वेद कुल कानि | मेरी महारानी श्री राधारानी || ”
- श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (38)

 वृन्दावन निकुंज की अधीश्वरी श्री राधारानी ही मेरी एक मात्र स्वामिनी हैं  इन्ही के बल पर मैंने लोक, वेद, और कुल की सभी मर्यादाओं को तोड़कर फेंक दिया है।