नवल किशोरी कुँवरि की, सहजहि ऐसी बानि।
ताको संग न छाँड़हीं, नैकु सरन गहे आनी॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (56)
श्रीराधारानी का यह सहज स्वभाव एवं विरद है कि जो भी एक बार उनकी शरण में अनन्य भाव से आ जाता है, वे उसका साथ कभी नहीं छोड़तीं।
ताको संग न छाँड़हीं, नैकु सरन गहे आनी॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (56)
श्रीराधारानी का यह सहज स्वभाव एवं विरद है कि जो भी एक बार उनकी शरण में अनन्य भाव से आ जाता है, वे उसका साथ कभी नहीं छोड़तीं।

