परमरसग्हस्य नन्दनिस्यन्दिवृन्दा
वनविपिननिकुञ्जे दिव्यदिव्यै र्विलासैः।
निरवधिरसमानौ राधिका कृष्णचन्द्रौ
भज सकलमुपेक्ष्य तावकी शास्त्रयुक्ती॥
- श्री निकुंज रहस्य तत्व, श्री रूप गोस्वामी (31)
रे मन ! देह, गेह, शास्त्रयुक्ति, प्रभृति का पूर्णतः उपेक्षा करके परमरस रहस्य आनन्द के सागर रूप वृन्दावन के निकुंज में दिव्यातिदिव्य विलासों से निरन्तर शोभायमान श्रीराधिका कृष्णचन्द्र का भजन कर।कृपया किसी भी आध्यात्मिक एवं पुराणों के विरोधी तर्कों को अनदेखा करें और निरंतर श्री राधा कृष्ण की भक्ति करें, जो नित्य श्री वृन्दावन धाम के निकुंजों में भ्रमण करते हैं एवं रस लुटाते हैं ।
वनविपिननिकुञ्जे दिव्यदिव्यै र्विलासैः।
निरवधिरसमानौ राधिका कृष्णचन्द्रौ
भज सकलमुपेक्ष्य तावकी शास्त्रयुक्ती॥
- श्री निकुंज रहस्य तत्व, श्री रूप गोस्वामी (31)
रे मन ! देह, गेह, शास्त्रयुक्ति, प्रभृति का पूर्णतः उपेक्षा करके परमरस रहस्य आनन्द के सागर रूप वृन्दावन के निकुंज में दिव्यातिदिव्य विलासों से निरन्तर शोभायमान श्रीराधिका कृष्णचन्द्र का भजन कर।कृपया किसी भी आध्यात्मिक एवं पुराणों के विरोधी तर्कों को अनदेखा करें और निरंतर श्री राधा कृष्ण की भक्ति करें, जो नित्य श्री वृन्दावन धाम के निकुंजों में भ्रमण करते हैं एवं रस लुटाते हैं ।

