सुनि मेरौ वचन छबीली राधा, तैं पायौ रस सिन्धु अगाधा ।
जो रस नेति-नेति श्रुति भाख्यौ, ताकौ तैं अधर सुधारस चाख्यौ ॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री हित चतुरासी (18)
जो रस नेति-नेति श्रुति भाख्यौ, ताकौ तैं अधर सुधारस चाख्यौ ॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री हित चतुरासी (18)
हे छविमयी राधे ! तू मेरी बात सुन ! तूने रस का गम्भीर समुद्र पाया है । जिस श्रीकृष्ण (परम पुरुष भगवान) के रस (लीला, प्रभाव, गुण माहात्म्य आदि) के लिये श्रुतियों ने भी (असमर्थता पूर्वक) नेति नेति कह दिया तूने तो उसका भी अधर रस पान किया है।

