व्यास बढाई और की, मेरे मन धिक्कार।
रसिकन की गारि भली, यह मेरौ श्रृंगार॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (35)
रसिकन की गारि भली, यह मेरौ श्रृंगार॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (35)
भक्तकवि श्रीहरिराम व्यासजी कहते हैं कि संसारी (विषयी) जनों द्वारा की गई स्तुति अथवा प्रशंसा सर्वथा तिरस्कार के योग्य है। मेरे लिए तो रसिक संतों द्वारा दी गई फटकार (गालियाँ) जो परम मंगलकारी और कल्याणप्रद हैं, क्योंकि वही मेरे जीवन का वास्तविक आभूषण और गौरव हैं।

