वृंदावन की लता सम, कोटि कलप तरु नाहिं।
रज की तुल बैकुंठ नहिं, और लोक किहिं माहिं॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (41)
रज की तुल बैकुंठ नहिं, और लोक किहिं माहिं॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (41)
करोड़ों कल्पतरु वृन्दावन की एक लता की तुलना नहीं कर सकते। यहाँ की रज के तुल्य वैकुण्ठ भी नहीं हैं, तो अन्य लोकों की तो चर्चा ही क्या करना।

