सुरतरु, नागरी, नेह निधान, स्यामा सरन मैं तेरी |
करुणाकर करुणा करि हेरौ, ढाई भरम कि ढेरी ||
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (36)
हे लाड़ली जी, आप ही केवल रसिकों के लिए कल्पलता हैं, चतुर शिरोमणि हैं, और प्रेम की निधि हैं। हे किशोरीजी, मैं आपकी शरण में हूँ। कृपा कर मेरे ऊपर स्नेह भरी दृष्टि डाल कर मेरे भ्रम एवं भय को दूर कर दीजिये।
करुणाकर करुणा करि हेरौ, ढाई भरम कि ढेरी ||
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (36)
हे लाड़ली जी, आप ही केवल रसिकों के लिए कल्पलता हैं, चतुर शिरोमणि हैं, और प्रेम की निधि हैं। हे किशोरीजी, मैं आपकी शरण में हूँ। कृपा कर मेरे ऊपर स्नेह भरी दृष्टि डाल कर मेरे भ्रम एवं भय को दूर कर दीजिये।

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