" ये अभिलाष लडैती मोरी,
तुम लालन संग मुदित विराजौ, मोहिं करौ मुखचंद चकोरी ||"
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (१७९)
तुम लालन संग मुदित विराजौ, मोहिं करौ मुखचंद चकोरी ||"
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (१७९)
हे राधारानी, मेरी यही अभिलाषा है की आप ठाकुर जी के संग मुदित विराजें और मैं आपको चकोर पक्षी जैसे चन्द्रमा को देखता है, वैसे देखुं एकटुक।

